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दो दिवसीय “प्राकृतिक खेती तकनीकी पर कृषक प्रशिक्षण“ का आयोजन

आजमगढ़ 28 दिसम्बर-- आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या के प्रोफेसर विजेंद्र सिंह एवं प्रसार निदेशक डॉक्टर एपी राव के निर्देशन में संचालित कृषि विज्ञान केंद्र कोटवा, आजमगढ़ पर दो दिवसीय “प्राकृतिक खेती तकनीकी पर कृषक प्रशिक्षण“ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम 27 से लेकर 28 दिसंबर 2022 तक चला। राज्य सरकार किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के लिए कई योजनाएं चला रही है, ताकि किसानों को आर्थिक लाभ मिल सके। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के होने का मुख्य कारण फसलों में कीटनाशक दवा और रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग करना है। प्राकृतिक खेती करने से फसलों की लागत कम होगी और उनके जहां कृषि उत्पाद महंगे बिकने से उनकी आमदनी भी ज्यादा होगी।
केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. डी.के. सिंह ने किसानों से आग्रह किया कि किसानों को प्राकृतिक खेती को अपनाना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्र से कृषि जानकारी प्राप्त कर फसल उत्पादकता व उनसे प्राप्त लाभ को बढ़ाने पर ध्यान दें।
प्रशिक्षण के नोडल अधिकारी डॉ. विजय कुमार विमल ने तकनीकी सत्र के दौरान बताया कि प्राकृतिक खेती कृषि की प्राचीन पद्धति है, प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। एक देसी गाय से 30 एकड़ की खेती की जा सकती है, इसकी विस्तृत जानकारी दी।
इस कार्यक्रम के प्रशिक्षण संयोजक एवं वरिष्ठ मृदा वैज्ञानिक डॉ0 रणधीर नायक ने कृषि विज्ञान केंद्र पर हो रहे प्राकृतिक खेती का भ्रमण कराकर बीजामृत एवं ब्रह्मास्त्र बनाने की विस्तृत जानकारी दी।
खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं, बिना पशुपालन के प्राकृतिक खेती संभव नहीं है, क्योंकि देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से ही प्राकृतिक खेती संभव है, इसकी जानकारी केंद्र के पशुपालन विभाग से वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ0 विनय कुमार सिंह ने दी और पशुओं को कैसे स्वस्थ रखा जाए एवं उनको ठंडी से उनकी सुरक्षा कैसे की जाए, इसके बारे में भी उन्होंने प्रकाश डाला।
केंद्र के शस्य एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर.के. सिंह ने जीवामृत बनाने की विधि पर प्रकाश डाला। उन्होने कहा कि पानी 170 लीटर, देसी गाय का गोबर, 10 किलोग्राम गोमूत्र, 8 से 10 लीटर, गुड 1 से डेढ़ किलो ग्राम, बेसन एक से डेढ़ किलोग्राम, बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की एक मुट्ठी मिट्टी, उपरोक्त सामग्रियों को अच्छी तरह 200 लीटर के प्लास्टिक के ड्रम में घोलने, घोलका घड़ी की सुई की दिशा में सुबह शाम 2 से 3 मिनट तक घोलें। इसको बोरी से ढ़क कर छांव में रख दें। यह घोल गर्मियों में तीन से चार दिन व सर्दियों में 6 से 7 दिन में तैयार हो जाएगा। तैयार होने के बाद इस घोल को गर्मियों में 7 दिन व सर्दियों में 14 दिन के अंदर अंदर सिंचाई की जाए। 
तकनीकी सत्र के दौरान फसल सुरक्षा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रुद्र प्रताप सिंह ने किसानों को नीमास्त्र बनाने की विस्तृत जानकारी दी। इसी के साथ रस चूसने वाले कीड़े, छोटी सूडी और झिल्लियों के लिए अग्नि अस्त्र बड़ी सूड़ियों और झिल्लियों के नियंत्रण के लिए ब्रह्मास्त्र बनाने की विधि की जानकारी दी। केंद्र की वैज्ञानिक पादप प्रजनन विभाग की डॉ0 अर्चना देवी ने इस सत्र के दौरान अच्छे बीजों का चयन कर अच्छे उत्पादन लेने की जानकारी दी। 
इस प्रशिक्षण में प्रगतिशील कृषक महेन्द प्रताप सिंह, अतुल प्रताप सिंह, प्रेमचंद, यशपाल, प्रेमलता, सुनीता जी के साथ 40 कृषक एवं महिला कृषक को प्रशिक्षित किया गया।

-------जि0सू0का0 आजमगढ़-28.12.2022--------


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