सीएचसी पर ट्रेनिंग दे रहे छात्रों के भरोसे इमरजेंसी सेवा, मरीजों की जान से खिलवाड़ का आरोप, शाम ढलते ही डॉक्टर और लाइसेंसधारी फार्मासिस्ट गायब
•बी-फार्मा ट्रेनीग देने वाले छात्र संभाल रहे मरीजों की जिम्मेदारी
देवरिया।
बरहज ,सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) बरहज में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि शाम ढलते ही अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था बी-फार्मा के ट्रेनीग दे रहे छात्रों के भरोसे छोड़ दी जाती है। बिना चिकित्सक और रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट की मौजूदगी के ट्रेनी छात्रों द्वारा मरीजों को दवा देने, रेफर स्लिप तैयार करने, इमरजेंसी रजिस्टर भरने और यहां तक कि इंजेक्शन अथवा टीका लगाने जैसे कार्य किए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इमरजेंसी जैसी संवेदनशील व्यवस्था में प्रशिक्षित चिकित्सक और लाइसेंसधारी फार्मासिस्ट की मौजूदगी जरूरी होने के बावजूद सीएचसी में रात के समय व्यवस्था बेहद लापरवाही नजर आती है। इमरजेंसी में तैनात वार्ड बॉय को भी कई बार नदारद रहने की शिकायत सामने आ रही है।
ट्रेनिंग दे रहे छात्रों ने खुद बताया अपना परिचय
रविवार की रात करीब नौ बजे अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था का जायजा लेने पर वहां कोई चिकित्सक मौजूद नहीं मिला। मौके पर मौजूद युवकों से जब उनके पद के बारे में जानकारी मांगी गई तो शुरुआत में वे स्पष्ट जवाब देने से बचते रहे। बाद में उन्होंने खुद को बी-फार्मा का ट्रेनिंग छात्र बताया।
मौके पर मौजूद ट्रेनिंग छात्रों के अनुसार, “हम लोग बी-फार्मा के ट्रेनिंग हैं। डॉक्टरों की अनुमति से प्रतिदिन इमरजेंसी में मरीजों की सेवा का कार्य करते हैं।”
हालांकि, सवाल यह है कि यदि इमरजेंसी में कोई गंभीर मरीज पहुंचता है तो उसकी जांच, बीमारी का आकलन और उपचार का निर्णय कौन लेता है? प्रशिक्षु छात्रों के भरोसे ऐसी जिम्मेदारी छोड़ना मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से कितना उचित है, यह जांच का विषय है।
नियमों को लेकर भी उठे सवाल
बी-फार्मा के विद्यार्थियों का प्रशिक्षण दवा और फार्मेसी संबंधी कार्यों की जानकारी हासिल करने के लिए होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे छात्रों से स्वतंत्र रूप से मरीजों का उपचार कराने के बजाय उन्हें सक्षम और पंजीकृत स्वास्थ्यकर्मी की निगरानी में रखा जाना चाहिए।
आरोप है कि सीएचसी बरहज में ट्रेनी छात्रों से इमरजेंसी में ऐसे कार्य कराए जा रहे हैं, जिनके लिए प्रशिक्षित एवं अधिकृत स्वास्थ्यकर्मी की आवश्यकता होती है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
गंभीर मरीजों को रेफर करने का भी आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि रात के समय अस्पताल पहुंचने वाले गंभीर मरीजों को समुचित चिकित्सकीय जांच के अभाव में रेफर कर दिया जाता है। वहीं कुछ मामलों में ट्रेनिंग द्वारा ही मरीज को दवा दिए जाने की बात भी सामने आ रही है।
लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में दूर-दराज से गरीब और जरूरतमंद मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में यदि इमरजेंसी व्यवस्था ही जिम्मेदार और अधिकृत स्वास्थ्यकर्मियों के बजाय प्रशिक्षुओं के भरोसे रहती है तो किसी भी समय गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
प्रभारी चिकित्सा अधीक्षक से नहीं हो सका संपर्क
मामले को लेकर प्रभारी चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बी.एन. यादव से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। अस्पताल प्रशासन का पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इमरजेंसी में ट्रेनिंग छात्रों से किस स्तर तक कार्य लिया जा रहा है और उस समय चिकित्सक तथा पंजीकृत फार्मासिस्ट की ड्यूटी व्यवस्था क्या थी।
अब सवाल यह है कि यदि रात में किसी मरीज की हालत अचानक गंभीर हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? अस्पताल प्रशासन को इस पूरे मामले की जांच कर इमरजेंसी व्यवस्था में जिम्मेदार एवं अधिकृत स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि मरीजों की जान जोखिम में न पड़े।

















































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