राजघाट के मानव कंकाल से खुलेगा प्राचीन काशी का आनुवंशिक रहस्य, बीएचयू ने शुरू किया डीएनए अध्ययन
•गंगा घाटी की प्राचीन आबादी, आहार और राखीगढ़ी से संभावित संबंधों की होगी वैज्ञानिक पड़ताल
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने भारतीय पुरातत्व और आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राजघाट उत्खनन से प्राप्त मानव कंकाल पर आनुवंशिक (Ancient DNA) एवं जैव-पुरातात्विक (Bio-archaeological) अध्ययन शुरू कर दिया है। इस शोध का उद्देश्य गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की आनुवंशिक पहचान, जीवनशैली, खान-पान और सिंधु घाटी सभ्यता के प्रसिद्ध पुरास्थल राखीगढ़ी के लोगों से संभावित संबंधों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना है।
यह अध्ययन न केवल काशी के हजारों वर्ष पुराने इतिहास के नए अध्याय खोल सकता है, बल्कि दक्षिण एशिया की प्राचीन आबादी के विकासक्रम और प्रवास को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
1940 में हुई थी राजघाट की खोज
राजघाट, वाराणसी के उत्तर-पूर्वी छोर पर गंगा और वरुणा नदियों के संगम के समीप स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। इसकी खोज वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के दौरान हुई थी। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और बीएचयू द्वारा किए गए उत्खननों में अनेक सांस्कृतिक परतें, आवासीय संरचनाएं, टेराकोटा प्रतिमाएं, मुहरें तथा अन्य दुर्लभ पुरावशेष प्राप्त हुए।
इन्हीं उत्खननों के दौरान एक संपूर्ण मानव कंकाल भी मिला था, जिसे बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में सुरक्षित रखा गया। अब पहली बार इस कंकाल का आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है।
प्राचीन डीएनए से खोजी जाएगी वंशावली
विभागाध्यक्ष प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार की पहल पर शुरू हुए इस अध्ययन के तहत एनशिएंट डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह ने कंकाल से अत्यंत सावधानी के साथ नमूने एकत्र किए।
प्रो. अहिरवार ने बताया कि राजघाट काशी की प्राचीनता और सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि गंगा घाटी के प्राचीन निवासी कौन थे, उनका आनुवंशिक स्वरूप कैसा था और उनका जीवन किस प्रकार का था।
राखीगढ़ी से होगा डीएनए का तुलनात्मक अध्ययन
यह परियोजना बीएचयू के जूलॉजी विभाग स्थित ‘ज्ञान लैब’ के सहयोग से संचालित की जा रही है। परियोजना से जुड़े प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि अध्ययन के दौरान प्राप्त प्राचीन डीएनए की तुलना राखीगढ़ी सहित दक्षिण एशिया के अन्य प्राचीन मानव नमूनों से की जाएगी।
उन्होंने कहा कि यदि राजघाट और राखीगढ़ी के लोगों के बीच आनुवंशिक समानता या भिन्नता के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं, तो इससे सिंधु घाटी और गंगा घाटी की प्राचीन आबादियों के संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी सामने आ सकती है।
तीन स्तर पर होगा वैज्ञानिक परीक्षण
शोध परियोजना के अंतर्गत तीन प्रमुख वैज्ञानिक परीक्षण किए जाएंगे—
प्राचीन डीएनए विश्लेषण – वंशावली, आनुवंशिक पहचान और अन्य प्राचीन आबादियों से संबंधों की जांच।
स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण – भोजन, आहार की आदतों और संभावित भौगोलिक आवागमन की जानकारी।
जैव-पुरातात्विक एवं रेडियोकार्बन डेटिंग – कंकाल की आयु, स्वास्थ्य स्थिति और उसकी सटीक काल-निर्धारण।
कुलपति ने बताया ऐतिहासिक पहल
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने इस पहल को पुरातत्व, इतिहास और आधुनिक विज्ञान के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अंतर-विषयक शोध भारत की प्राचीन विरासत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे और विश्वविद्यालय की शोध परंपरा को नई दिशा देंगे।
भारत के प्राचीन इतिहास पर पड़ेगा दूरगामी प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन गंगा घाटी की प्राचीन जनसंख्या, उनके खान-पान, स्वास्थ्य, प्रवास और आनुवंशिक विकास को समझने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। साथ ही यह शोध काशी के प्राचीन इतिहास और दक्षिण एशिया की सभ्यताओं के आपसी संबंधों पर भी नई रोशनी डालेगा।

























































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