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स्कूटी सूची में ‘मेधा का चमत्कार’ या शिक्षा व्यवस्था का खेल?

•  80 फीसदी से अधिक लाभार्थी चुनिंदा स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों से! विश्वविद्यालय और अनुदानित कॉलेजों की पढ़ाई पर बड़ा सवाल    ।
           
देवरिया। महारानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना में चयनित छात्राओं की सूची ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब अब सिर्फ कागजों से नहीं चलेगा।
      सूची के अनुसार 80 प्रतिशत से अधिक लाभार्थी छात्राएं स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों से बताई जा रही हैं। यानी जिन संस्थानों के पास न विश्वविद्यालय जैसी सुविधाएं हैं, न अनुदानित महाविद्यालयों जैसा भारी वेतन बजट—वहीं से मेधावी छात्राओं की इतनी बड़ी संख्या आखिर कैसे निकल रही है?
   क्या इन महाविद्यालयों में अध्यापन का कोई ऐसा ‘गुप्त फॉर्मूला’ है, जिसकी जानकारी विश्वविद्यालयों के विद्वान प्रोफेसरों तक को नहीं है?
या फिर इस आंकड़े की तह में जाकर जांच करने की जरूरत है?
‘क्लास’ का पता नहीं, मेधा का ठिकाना तय!
    कुछ स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों को लेकर विद्यार्थियों और स्थानीय स्तर पर यह चर्चा अक्सर सुनाई देती है कि वर्ष भर महाविद्यालय में प्रवेश, परीक्षा और शुल्क वसूली जैसी गतिविधियां तो दिखाई देती हैं, लेकिन नियमित कक्षाओं और वास्तविक अध्यापन की स्थिति पर सवाल बने रहते हैं।
ऐसे में सवाल और भी दिलचस्प हो जाता है—
      अगर कक्षाएं शानदार चल रही हैं तो उसका निरीक्षण कौन करता है?
अगर अध्यापन उत्कृष्ट है तो उसकी निगरानी कौन कर रहा है?
और अगर परिणाम इतने शानदार हैं तो इसका शैक्षणिक मॉडल बाकी महाविद्यालयों में क्यों नहीं लागू किया जा रहा?
   क्यों न इन ‘मेधा उत्पादक’ महाविद्यालयों की शिक्षण पद्धति पर बाकायदा शोध कराया जाए?   
विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों की ट्रेनिंग अब यहीं से हो!
       जब चुनिंदा स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों से इतनी बड़ी संख्या में मेधावी छात्राएं निकल रही हैं तो सरकार को एक अभिनव प्रयोग करना चाहिए।
कार्यशाला आयोजित हो।
          विश्वविद्यालय और अनुदानित महाविद्यालयों के शिक्षकों को प्रतिभागी बनाया जाए और सफल स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के शिक्षकों को ‘मास्टर ट्रेनर’।
विषय हों—
* बिना भारी-भरकम बजट के उत्कृष्ट परिणाम कैसे लाएं?
* कम संसाधनों में मेधा का उत्पादन कैसे बढ़ाएं?
* विद्यार्थियों को ऐसी कौन-सी शिक्षा दें कि वे सरकारी संस्थानों के विद्यार्थियों को पीछे छोड़ दें?
* और सबसे महत्वपूर्ण—वह कौन-सी शिक्षण तकनीक है जिसकी वजह से मेधा का भूगोल कुछ चुनिंदा कॉलेजों तक सिमट गया है?अगर प्रयोग सफल रहा तो विश्वविद्यालयों के लिए यह ऐतिहासिक उपलब्धि होगी—प्रोफेसर पढ़ाने जाएंगे और ‘गुरु’ सीखकर लौटेंगे!⸻. असली जांच इन पांच सवालों की

1. कितनी कक्षाएं चलीं?
    चयनित छात्राओं के महाविद्यालयों में पूरे शैक्षणिक सत्र में वास्तविक अध्यापन का रिकॉर्ड क्या है?
2. उपस्थिति कितनी वास्तविक?
    रजिस्टर में दर्ज उपस्थिति और कक्षा में मौजूद विद्यार्थियों का मिलान कभी हुआ?
3. परिणामों का पैटर्न क्या कहता है?
   क्या लगातार वर्षों से वही चुनिंदा महाविद्यालय असाधारण संख्या में मेधावी विद्यार्थी दे रहे हैं?
4. परीक्षा व्यवस्था कितनी पारदर्शी?
        परीक्षा केन्द्रों की व्यवस्था और निगरानी पर कोई स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ?
5. शिक्षकों का वास्तविक योगदान कितना?
जिस शिक्षक के नाम पर महाविद्यालय की मान्यता या अनुमोदन कायम है, क्या वह पूरे सत्र में नियमित अध्यापन भी करता है?

‘मेधा’ की भी कभी ऑडिट होगी?
      उच्च शिक्षा में संस्थानों की मान्यता, शिक्षकों की संख्या, भवन, प्रयोगशालाएं और कागजी रिकॉर्ड की जांच तो होती रहती है। लेकिन अब समय शायद ‘मेधा की ऑडिट’ का है।
किस संस्थान से कितने मेधावी विद्यार्थी निकले, उनके अंक कैसे आए, उनकी कक्षाएं कितनी चलीं, परीक्षा व्यवस्था कैसी रही और परिणाम लगातार असाधारण क्यों हैं—इन सभी पहलुओं का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।
क्योंकि अगर वास्तव में स्ववित्तपोषित महाविद्यालय बेहतर पढ़ा रहे हैं तो यह उनका श्रेय है और विश्वविद्यालयों तथा अनुदानित महाविद्यालयों के लिए आत्ममंथन का विषय।लेकिन यदि परिणामों और वास्तविक शैक्षणिक गतिविधियों के बीच कोई असामान्य अंतर मिलता है, तो फिर मामला केवल स्कूटी योजना तक सीमित नहीं रहेगा।

बड़ा सवाल
सरकारी वेतन बजट भारी, फिर मेधा का पलड़ा हल्का क्यों?विश्वविद्यालय केन्द्रों और अनुदानित महाविद्यालयों में शिक्षकों पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती है। दूसरी ओर स्ववित्तपोषित संस्थान अपने सीमित संसाधनों में चलते हैं।
फिर सवाल उठता है—
    यदि महंगे संसाधन और भारी वेतन बजट वाले संस्थान मेधावी विद्यार्थियों की दौड़ में पीछे हैं तो आखिर कमी कहां है?
शिक्षकों में?
व्यवस्था में?
अध्यापन में?
परीक्षा प्रणाली में?
या फिर मेधा के आंकड़े ही कोई अलग कहानी बता रहे हैं?
 ‘आदर्श कॉलेज’ की तलाश खत्म!
सरकार चाहे तो स्कूटी योजना की सूची को ही आधार बनाकर ‘मेधा मॉडल कॉलेज’ चुन सकती हैi 
फिर इन संस्थानों की शिक्षण पद्धति पर पीएचडी कराई जाए।
विश्वविद्यालयों में विभाग खोले जाएं—
   ‘स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों से मेधा उत्पादन अध्ययन केन्द्र।’और यदि शोध में पता चल जाए कि वहां वास्तव में उत्कृष्ट अध्यापन हो रहा है तो देश की उच्च शिक्षा को नया मॉडल मिल जाएगा।
और यदि ऐसा नहीं निकलता…तो कम से कम यह पता चल जाएगा कि स्कूटी ने छात्राओं को जरूर दौड़ाया, लेकिन उसकी सूची ने उच्च शिक्षा व्यवस्था को भी दौड़ाकर सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया
अब निगाह जांच पर
महारानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना छात्राओं को प्रोत्साहन देने की महत्वपूर्ण पहल है। इसलिए चयन सूची पर सवाल उठाना योजना के उद्देश्य पर सवाल उठाना नहीं है।
सवाल सिर्फ इतना है कि मेधा के इतने बड़े अंतर का कारण क्या है?यदि चयन पूरी तरह पारदर्शी है और छात्राओं की उपलब्धियां वास्तविक हैं तो सरकार को संबंधित संस्थानों के शैक्षणिक मॉडल को सार्वजनिक करना चाहिए।
और यदि कहीं परिणाम, उपस्थिति, अध्यापन या परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी की आशंका है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।क्योंकि स्कूटी छात्राओं को मिली है, लेकिन सवाल अब पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था चला रही है।


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