अरुण कुमार प्रजापति को नेपाल में मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान, गाँव के बच्चों को बना रहे हैं भविष्य का सितारा
सुल्तानपुर। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से निकलकर देश-विदेश में नाम रोशन करने वाले अरुण कुमार प्रजापति को नेपाल के लुंबिनी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समारोह में“बुद्ध इंटरनेशनल आइकन एक्सीलेंट एजुकेशन अचीवर्स अवॉर्ड 2025”से नवाज़ा गया। यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति की मेहनत का फल नहीं है, बल्कि शिक्षा के प्रति उनके जुनून, समर्पण और समाज को कुछ लौटाने की ललक का प्रतीक है।
लुंबिनी स्थित बौद्ध विश्वविद्यालय में हुए इस गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन साउथ एशियन फॉर डेवलेपमेंट इनिशिएटिव, आध्यात्मिक विश्वविद्यालय पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) और इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। जब अरुण कुमार प्रजापति को मंच पर बुलाया गया, तो तालियों की गड़गड़ाहट इस बात की गवाही दे रही थी कि शिक्षा के इस सच्चे सिपाही ने दिल जीत लिए हैं।
अरुण कुमार प्रजापति मूलतः सुल्तानपुर जनपद के मोतिगरपुर विकास खंड के कैथाना गोरसरा स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक हैं। लेकिन उनकी असली पहचान वहाँ खत्म नहीं होती। विद्यालय की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब दूसरे शिक्षक आराम करते हैं, तब अरुण कुमार अपने किराए के छोटे से मकान में गांव-गांव के दर्जनों बच्चों को निःशुल्क पढ़ाते हैं वो भी प्रतियोगी परीक्षाओं की विशेष तैयारी के साथ। चाहे नवोदय प्रवेश परीक्षा हो, विद्याज्ञान हो, NMMSE हो या SHRESHTA हर परीक्षा की तैयारी वे इतने समर्पण से करवाते हैं कि उनके पढ़ाए बच्चे हर साल बड़ी संख्या में चयनित होकर गाँव का नाम रौशन कर रहे हैं।
उनके पास आने वाले बच्चे गोरसरा, भैरोपुर, बागसराय, राईबिगो, श्रीरामपुर लमौली, राघवपुर, खनुहट, भुवरपुर हांसापुर और कई अन्य गाँवों से आते हैं। बिना किसी फीस, बिना किसी दिखावे के, अरुण कुमार सिर्फ एक उद्देश्य से ये सेवा कर रहे हैं कि गाँव के बच्चे भी बड़े सपने देखें और उन्हें पूरा करने की ताक़त हासिल करें।
कार्यक्रम में देशभर से नामचीन हस्तियाँ शामिल रहीं। मुख्य अतिथि रहीं डॉ. लवली शर्मा , जो इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़ की कुलपति हैं। साथ ही मंच पर डॉ. मनिक रत्न शाक्य (डीन, बौद्ध अध्ययन संकाय, लुंबिनी), IPS डॉ. बी.पी. अशोक और गोपाल किरण समाज सेवी संस्था ग्वालियर के निदेशक श्रीप्रकाश सिंह नीमराजे की मौजूदगी ने इस समारोह को और भी भव्य बना दिया।
यह सम्मान सिर्फ अरुण कुमार प्रजापति को नहीं, बल्कि उस सोच को मिला है जो कहती है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी का ज़रिया नहीं, समाज को बदलने की क्रांति है। नेपाल में सम्मानित होकर अरुण ने न सिर्फ जिले का, बल्कि पूरे देश का मान बढ़ाया है। उनकी कहानी उस मशाल की तरह है, जो अंधेरे में भी रोशनी की राह दिखाती है। अब सवाल ये है क्या ऐसे गुरुओं को सिर्फ तालियाँ काफी हैं, या उन्हें वो मंच भी मिलना चाहिए जहाँ से पूरे देश के शिक्षक प्रेरणा ले सकें?




























































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