हरि तालिका तीज व्रत पर विशेष आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी
देवरिया।शास्त्रों और पुराणों में हरितालिका तीज व्रत को 'व्रतराज' (सभी व्रतों का राजा) माना गया है।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाने वाला यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन स्त्रियों द्वारा अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु तथा मनचाहा वर पाने हेतु कुंवारी कन्याओं द्वारा अत्यंत श्रद्धा के साथ किया जाता है।
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण एवं निर्णय-सिंधु के अनुसार इस व्रत की महिमा, लाभ और फल का विस्तृत वर्णन नीचे संस्कृत श्लोकों एवं उनके हिंदी भावार्थ के साथ प्रस्तुत है:
१. अखंड सौभाग्य एवं अवैधव्य की प्राप्ति
हरितालिका तीज व्रत का सबसे प्रमुख लाभ स्त्रियों को अखंड सौभाग्य (अवैधव्य) की प्राप्ति है।
माता पार्वती ने स्वयं भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का कठोर अनुष्ठान किया था।
चतुर्थी सहिता या तु सा तृतीया फलप्रदा।
अवैधव्यकरा स्त्रीणां पुत्रपौत्रप्रवर्धिनी॥
चतुर्थी तिथि से युक्त जो तृतीया (हरितालिका) होती है, वह अत्यंत फलदायी होती है। यह स्त्रियों को अवैधव्य (पति की अकाल मृत्यु से रक्षा और अखंड सौभाग्य) प्रदान करने वाली तथा पुत्र-पौत्रों एवं वंश की वृद्धि करने वाली है।
२. सर्वपाप मुक्ति एवं मोक्ष का साधन
इस व्रत का अनुष्ठान करने से पूर्व जन्मों के साथ-साथ इस जन्म के भी जाने-अनजाने में हुए सभी कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं।
भाद्रे मासि सिते पक्षे तृतीया हस्तसंयुता।
तदनुष्ठानमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की हस्त नक्षत्र से युक्त तृतीया तिथि को इस व्रत का केवल अनुष्ठान मात्र कर लेने से ही मनुष्य समस्त प्रकार के पापों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है।
३. मनोवांछित फल एवं सुख-समृद्धि की प्राप्ति
इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विधिवत बालुका (रेत) का लिंग बनाकर पूजन करने से साधक को जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है।
येन कामेन देवि त्वं पूजितासि महेश्वरि।
राज्यसौभाग्यसंपत्ति देहि मामम्ब पार्वति॥
हे देवी! हे महेश्वरी! जिस-जिस मनोकामना से स्त्रियों द्वारा आपका पूजन किया जाता है, हे मां पार्वती! आप उन सभी को राज्य, अखंड सौभाग्य, आरोग्य और अपार धन-संपत्ति प्रदान करती हैं।
४. भयों और कष्टों से रक्षा
संसार के समस्त भय, संताप, रोग और दुखों का निवारण करने के लिए यह व्रत एक अचूक ढाल की तरह कार्य करता है।
संतापभयसंतप्तात् पाहि मां सिंहवाहिनि।
सर्वदुःखापहरे देवि नमस्ते शंकरप्रिये॥
हे सिंहवाहिनी माता! विभिन्न प्रकार के संतापों और भयों से पीड़ित मेरी रक्षा करें। हे भगवान शंकर की प्रियतमे देवी! आप समस्त दुखों का हरण करने वाली हैं, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है।
५. हरितालिका व्रत के मुख्य नियम व महिमा
निराहार एवं निर्जला व्रत: यह व्रत पूर्णतः निर्जला और निराहार रहकर किया जाता है। रात्रि में जागरण करके शिव-पार्वती का चार प्रहर पूजन करने का विधान है।
पार्वती-शिव का सायुज्य: देवीभागवत के अनुसार जो स्त्री इस व्रत को निष्ठापूर्वक करती है, वह जीवन भर समस्त सांसारिक सुखों को भोगकर अंत समय में शिवलोक (कैलास) को प्राप्त करती है।
कन्याओं के लिए फल:
कुंवारी कन्याएँ यदि इस व्रत को रखती हैं, तो उन्हें सर्वगुण संपन्न और योग्य पति की प्राप्ति होती है।
हरितालिका तीज की प्रामाणिक पूजा विधि
संकल्प एवं तैयारी:
भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन प्रातः स्नान के बाद निर्जला व्रत का संकल्प लें। ध्यान रहे बिना संकल्प किसी भी प्रकार की पूजा निष्फल हो जाती है
सायंकाल (प्रदोष काल) में स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को सजाएं।
प्रतिमा निर्माण: शुद्ध मिट्टी या बालू (रेत) से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश जी की सुंदर मूर्तियां बनाएं।
चौकी स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मूर्तियों की स्थापना करें और कलश स्थापित करें।
षोडशोपचार पूजन: सबसे पहले श्री गणेश जी का पूजन करें। तत्पश्चात शिव-पार्वती को जल, दूध, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, और बेलपत्र अर्पित करें।
सुहाग सामग्री अर्पण: माता पार्वती को संपूर्ण सुहाग सामग्री (सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, मेहंदी आदि) चढ़ाएं।
कथा एवं आरती: हरितालिका तीज की कथा सुनें या पढ़ें और अंत में कपूर से आरती करें।
रात्रि जागरण: पूरी रात जागकर चारों प्रहर में भगवान शिव और पार्वती की अलग-अलग पूजा और मंत्र जाप करें।
चारों प्रहर की पूजा के विशिष्ट मंत्र
हरितालिका तीज की रात्रि में चार प्रहर (प्रत्येक ३ घंटे) की पूजा का विशेष महत्व है। प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग सामग्री और श्लोक से पूजन किया जाता है:
१. प्रथम प्रहर पूजा (सायंकाल / संध्या समय)
विशेष अर्पण: दूध से अभिषेक और बेलपत्र।
मंत्र:
ॐ नमः शिवाय शान्ताय पंचवक्त्राय शूलिने।
नन्दिभृंगि महाव्यालगणयुक्ताय शम्भवे॥
पंचमुख, त्रिशूलधारी, शांत स्वरूप और नंदी-भृंगी से आवृत भगवान शिव को प्रणाम है।
२. द्वितीय प्रहर पूजा (रात्रि का मध्य पूर्व भाग)
विशेष अर्पण: दही से अभिषेक और दूर्वा/समी पत्र।
मंत्र:
शिवायै हरकान्तायै प्रकृत्यै सृष्टिहेतवे।
नमस्ते ब्रह्मचारिण्यै जगद्धात्र्यै नमो नमः॥
भावार्थ: प्रकृति स्वरूपा, सृष्टि की कारण और शिव की प्रियतमा माता पार्वती को बारंबार नमस्कार है।
३. तृतीय प्रहर पूजा (मध्य रात्रि)
विशेष अर्पण: घृत (घी) से अभिषेक और धतूरा/आक के पुष्प।
मंत्र:
संतापभयसंतप्तात् पाहि मां सिंहवाहिनि।
येन कामेन देवि त्वं पूजितासि महेश्वरि॥
हे सिंहवाहिनी! समस्त दुखों व भयों से मेरी रक्षा करें और मेरी मनोकामनाएं पूर्ण करें।
४. चतुर्थ प्रहर पूजा (उषाकाल / भोर समय)
विशेष अर्पण: शहद व शक्कर से अभिषेक और कनेर के फूल।
मंत्र:
राज्यसौभाग्यसंपत्ति देहि मामम्ब पार्वति।
सर्वदुःखापहरे देवि नमस्ते शंकरप्रिये॥
हे मां पार्वती! मुझे अखंड सौभाग्य, संपत्ति और आरोग्य प्रदान करें। हे शंकरप्रिये! आपको मेरा प्रणाम है।
व्रत पारण (समापन)
अगले दिन (चतुर्थी तिथि के सूर्योदय के बाद) अंतिम पूजा करें, माता पार्वती को चढ़ाया गया सिंदूर स्वयं लगाएं, सुहाग सामग्री और भोजन किसी सुपात्र ब्राह्मण या सौभाग्यवती स्त्री को दान करें। इसके बाद जल ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
यह भारतीय धर्मशास्त्र एवं पंचांग (निर्णय-सिंधु/धर्म-सिंधु) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंश है, जिसमें हरितालिका तीज व्रत, चंद्र दर्शन निषेध (कलंक चतुर्थी) और ऋषि पंचमी के शास्त्रीय नियम व पूजन मंत्र दिए गए हैं।
१. हरितालिका व्रतम् (हरितालिका तीज नियम)
शास्त्रीय विधान: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका व्रत किया जाता है। इसमें परा (बाद की / चतुर्थी युक्ता) तृतीया तिथि ग्राह्य होती है। यदि अगले दिन मुहूर्त मात्र (कम समय) के लिए भी तृतीया तिथि रहे, तो उसी दिन गौरी (पार्वती) व्रत करना चाहिए।
पुण्य फल: जो तृतीया तिथि चतुर्थी से संयुक्त होती है, वह फलप्रदा, स्त्रियों को अवैधव्य (अखण्ड सौभाग्य) प्रदान करने वाली तथा पुत्र-पौत्र की वृद्धि करने वाली होती है।
निषेध (सावधानी): जो स्त्री अज्ञानता या भ्रम (विमोहिता) के कारण द्वितीया से युक्त तृतीया को यह व्रत करती है, विद्वान आचार्यों (मनीषियों) के अनुसार वह वैधव्य (पति का वियोग) को प्राप्त करती है।
विशेष योग: भाद्रपद शुक्ल तृतीया यदि हस्त नक्षत्र से युक्त हो, तो केवल उस अनुष्ठान मात्र से ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। अधिक मास लगने से व्रत निषेध नहीं है अतः सबको श्रद्धा से इस व्रत को करना चाहिए। भ्रम में ना पड़ें।






















































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