Religion and Culture / धर्म और संस्कार

पितृ तर्पण विशेष

देवरिया।पितृ तर्पण के क्रियात्मक पक्ष से अवगत हों और जो लोग तर्पणाधिकारी हैं(जिनके पिता नहीं हैं) वे अवश्य तर्पण करें।यदि कोई गया श्राद्ध,पुष्कर श्राद्ध और बद्रीनाथ ब्रह्मपाली में श्राद्ध कर लिए हैं वो भी तर्पण अवश्य करें।

जितने पुत्र हैं सभी को तर्पण अवश्य करना चाहिए।

संध्योपासन के बाद तर्पणाधिकारी को तर्पण करना चाहिए।

शास्त्रों में नित्य देव, ऋषि और पितृ तर्पण का विधान है जिसका संक्षिप्त क्रम इस प्रकार है.....

प्रथम पूर्वाभिमुख होकर, सव्य अवस्था में आचमन कर के,पवित्रीधारण करें,जल से शरीर शुद्धि,दाहिने हाथ में त्रिकुशा, चावल, जल लेकर संकल्प करें 

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्यैतस्य मासोतमे मासे ………. २ मासे ………… ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५ वासरे ………… ६ गोत्रोत्पन्नः ………… ७ शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त सर्व सांसारिक सुख-समृद्धि प्राप्ति च आरोग्यता वंश-वृद्धि व्यापारवृद्धयर्थं देवऋषिमनुष्ययमपितृतर्पणम अहं करिष्ये।

देवतर्पण, 

 – देवतीर्थ अर्थात अंगुली के अगले भाग से होते हुए चावल के साथ जल गिरे इसका ध्यान रखते हुए निम्न मंत्र पढ़ते हुए एक एक अंजली दे 

ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। 

ॐ विष्णुः तृप्यताम्। 

ॐ रुद्रः तृप्यताम्। 

ॐ प्रजापतिः तृप्यताम्।

इसके पश्चात निम्न मंत्र से एक अंजली जल से पूर्वोक्त मंत्र से अन्यान्य दिव्य जीवों का तर्पण करे।

ॐ देवाः यक्षास्तथा नागाः गन्धर्वाऽपरससोऽसुराः।

क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्भकाः खगाः॥

विद्याधरा जलाधाराः तथैवाऽऽकाशगामिनः।

निराधाराश्च ये जीवाः पापेऽधर्मे रताश्च ये।

तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया॥

अब उत्तर दिशा की ओर मुख कर के, यज्ञोपवीत को गले में माला की तरह कर के सनकादि ऋषियों का आवाहन करते हुए उनका दो दो अंजली जल जौ के साथ जल को ऋषितीर्थ से गिराते हुए निम्न मंत्रों से तर्पण करे।

ॐ सनकश्च सनन्दनश्च तृतीयश्च सनातनः।

कपिलश्चाऽसुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा॥

सर्वे ते तृप्तिमायान्तु मद् दत्तेनाऽम्बुना सदा॥

इसके बाद 

ॐ सनकस्तृप्यताम

ॐ सनन्दनस्तृप्यताम

ॐ तृतीयस्तृप्यताम

ॐ सनातनस्तृप्यताम

ॐ कपिलस्तृप्यताम

ॐ आसुरिस्तृप्यताम

ॐ वोढुस्तृप्यताम

ॐ पंचशिखस्तृप्यताम

अब मरीचि आदि ऋषियों का तर्पण पुनः पूर्वाभिमुख होकर सव्य होकर देवतीर्थ से जल गिराते हुए एक एक अंजलि जल से निम्न मंत्रों से तर्पण करें

ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। 

ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। 

ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। 

ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। 

ॐ पुलहस्तृप्यताम्। 

ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। 

ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। 

ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। 

ॐ भृगुस्तृप्यताम्। 

ॐ नारदस्तृप्यताम्।

इसके पश्चात दक्षिणाभिमुख होकर और अपसव्य होकर एक एक अंजलि तिल जल से दिव्य पितरों का तर्पण हथेली के पितृ तीर्थ से जल गिराते हुए करें, काला तिल के साथ निम्न मंत्रों का पाठ करते हुए तर्पण करें....

ॐ अग्निष्वात्तास्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

ॐ सौम्यास्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

ॐ हविष्मन्तस्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

ॐ उष्मपास्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

ॐ सुकालिनस्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

ॐ बर्हिषदस्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

ॐ आज्यपास्तृप्यन्ताम्, इदं जलं तेभ्यः स्वधा नमः।

अब पूर्वोक्त प्रकार से ही यम धर्मराज की विभिन्न मूर्तियों का तर्पण निम्न मंत्रों का पाठ करते हुए करें

ॐ यमाय नमः। 

ॐ धर्मराजाय नमः। 

ॐ मृत्यवे नमः। 

ॐ अन्तकाय नमः। 

ॐ वैवस्वताय नमः। 

ॐ कालाय नमः। 

ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः। 

ॐ औदुम्बराय नमः। 

ॐ दध्नाय नमः। 

ॐ नीलाय नमः। 

ॐ परमेष्ठिने नमः। 

ॐ वृकोदराय नमः। 

ॐ चित्राय नमः। 

ॐ चित्रगुप्ताय नमः। 

ॐ चतुर्दशैते यमाः स्वस्ति कुर्वन्तु तर्पिताः।

अब पूर्वोक्त रीति से अर्थात दक्षिणाभिमुख और अपसव्य अवस्था में ही, पितृतीर्थ से तिल जल की तीन तीन अंजलि देते हुए अपने पितृकुल (पिता, पितामह आदि) और मातृकुल (मातामह प्रमातामह आदि) के पितरों का तर्पण करना चाहिए...

यथा.....

ॐ अद्य अमुकगोत्रः पिता अमुकशर्मा तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रः पितामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रः प्रपितामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा॥

ॐ तृप्यध्वम् – ॐ तृप्यध्वम् – ॐ तृप्यध्वम्॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रः मातामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रः प्रमातामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रः वृद्धप्रमातामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा, तस्मै स्वधा॥

ॐ तृप्यध्वम् – ॐ तृप्यध्वम् – ॐ तृप्यध्वम्॥

अब समय होने पर और यथा स्थिति माता आदि के न रहने पर 

उनका भी तर्पण एक एक अंजलि से पूर्वोक्त प्रकार से करें....

यथा....

ॐ अद्य अमुकगोत्रा माता अमुकीदेवी तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्यै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकेगोत्रा पितामही अमुकीदेवी तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्यै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रा प्रपितामही अमुकीदेवी तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्यै स्वधा॥

ॐ तृप्यध्वम्!

ॐ अद्य अमुकगोत्रा मातामही अमुकीदेवी तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्यै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रा प्रमातामही अमुकीदेवी तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्यै स्वधा॥

ॐ अद्य अमुकगोत्रा वृद्धप्रमातामही अमुकीदेवी तृप्यतामिदं (सतिलं) जलं तस्यै स्वधा॥

ॐ तृप्यध्वम्!

अब जिनकी सौतेली मां,या पत्नी या अन्य चाचा इत्यादि है उनको भी जल दक्षिणाभिमुख पितृतिर्थ से तिल के साथ एक एक अंजलि जल दें।

ॐ अद्य...गोत्रा अस्मत्(जो भी हो नाम रख लें)..तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै/तस्यै स्वधा नमः।

पुरुष को तस्मै और स्त्री को तस्यै स्वधा नमः बोल कर जल गिराएं।

इसके बाद निम्न मंत्र से एक अंजलि जल पुनः प्रदान करें

ॐ येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।

ते तृप्तिमखिला यान्तु यच्चाऽस्मत्तोऽभिवाञ्छति॥

अब दुपट्टे की कोर को पानी से भीगा कर निचोड़ते हुए निम्न मंत्र पढ़ें

ॐ ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।

ते पिबन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥

भीष्म पितामह को एक अंजलि जल दें।

मंत्र -वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च।अपुत्राय ददाम्येतज्जलं भीष्माय वर्मणे।

अब सव्य होकर पूर्वाभिमुख होकर तीन बार गायत्री जप कर पवित्र हो जाएं, सूर्यार्घ दें,सूर्यनारायण को प्रणाम करें, और समस्त कर्म भगवान को अर्पित कर दें।

नोट:

1.सभी लोग जिनके माता-पिता अथवा पिताजी नहीं है, उन्हें नित्य तर्पण करना ही चाहिए।जितने भी पुत्र हैं सभी को तर्पण करने का अधिकार है।

2. जो लोग समयाभाव के कारण या अन्य किसी कारणवश नित्य तर्पण नहीं कर सकते उन्हें पितृ पक्ष में प्रतिदिन तर्पण करना चाहिए।

3. उपरोक्त तर्पण विधि शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के वाजसनेयी ब्राह्मणों की है।

उत्तर भारत के अधिकांश ब्राह्मण इसी शाखा से संबंधित हैं।

अन्य शाखा के ब्राह्मण भी मामूली हेर फेर या बिल्कुल उपरोक्त प्रकार से ही तर्पण कर सकते हैं।

4. सव्य होने का मतलब यज्ञोपवीत बाए कंधे पर डाल कर दाहिनी तरफ लटकता रहे जो कि, सामान्यत: रहता है।

अपसव्य होने का मतलब यज्ञोपवीत को फेर कर दाहिने कंधे पर डालकर बांयी तरफ रखना।

5. पितृ तर्पण आदि, यथा संभव खुले स्थान पर करना चाहिए, खुला स्थान न हो तो छत पर करें, छत अपनी ना हो तो, बालकनी में करें, बालकनी भी ना हो तो कमरे में करें, परंतु करें अवश्य।

6. पितरों को तिल आदि मिश्रित जल से तर्पण करने से अत्यंत प्रसन्नता होती है, फिर भी यदि तिल ना हो तो, बिना तिल के सामान्य जल से तर्पण करें परंतु करें अवश्य। ऐसी स्थिति में उपरोक्त लेख में जहां कोष्ठक में सतिलं लिखा है तो वह सतिलं ना पढ़ें।

7. यह लेख देव, ऋषि और पितृ तर्पण के क्रियात्मक पक्ष पर है।

पूरी विधि में 7 - 10 मिनट से अधिक नहीं लगेगा।

8. देव, ऋषि और पितृ तर्पण की इस विधि को करने में एक भी पैसा नहीं लगना है अतः अवश्य करें।

9. यथा संभव कुश की पवित्री, त्रिकुशा, मोटक आदि का उपयोग करें।

10. कोई भी वस्तु उपलब्ध नहीं रहने से बहाना बनाकर तर्पण कर्म छोड़े नहीं बल्कि अवश्य करें।

11. तर्पण का जल किसी पीतल या कांसे की थाली में गिराएं और बाद में उसे किसी पेड़ की जड़ में डाल दें।

12. करने से पूर्व एक दो दिन सम्पूर्ण लेख 10 या 15 बार पढ़ लीजिए, विधि याद हो जायेगी।

13. हमलोगों में पितृ पक्ष में निर्धारित तिथि पर पार्वण करने की परंपरा है, तो, जो पार्वण भी कर सकें तो बहुत ही अच्छी बात।

....और अंत में भगवान की कृपा से जिनके पिता या माता पिता जीवित हैं उसे पितृ तर्पण की ना ही आवश्यकता है और ना ही अधिकार, तो ऐसे लोग भगवान का आभार व्यक्त करना ना भूलें।


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