पुत्रों की दीर्घायु के लिए सरयू तट पर उमड़ा मातृशक्ति का सैलाब, जितिया पूजन में दिखा अटूट विश्वास और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम
देवरिया। मईल थाना क्षेत्र घाघरा नदी के तट पर पुत्रों की लंबी आयु, सुख-शांति और समृद्धि की कामना को लेकर जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत के अवसर पर क्षेत्र के विभिन्न नदी घाटों पर हजारों की संख्या में माताओं की भीड़ उमड़ पड़ी। सरयू नदी के तट पर सुबह से ही श्रद्धा और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। माताओं ने पारंपरिक विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर अपने पुत्रों के मंगलमय जीवन की कामना की।
इस अवसर पर बैरियार नामक पौधे का विशेष महत्व देखने को मिला। माताएं रात में ही इस पौधे को अपने साथ लेकर घाटों पर पहुंचीं। विधि-विधान से पूजन करने के बाद पौधे को जमीन में रोपित किया। इस परंपरा को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पौधे की मजबूती के प्रतीक के रूप में माताएं अपने पुत्रों के जीवन, परिवार और वंश की निरंतर उन्नति तथा मजबूती की कामना कर रही हों।
जीवित्पुत्रिका व्रत का संबंध महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा से भी जुड़ा है। मान्यता है कि अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु के पुत्र को नष्ट करने का प्रयास किया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कृपा से उस शिशु को जीवनदान दिया। वही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित कहलाया। कहा जाता है कि इसी प्रसंग से संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा जुड़ी हुई है। एक अन्य प्रचलित कथा में जिमूतवाहन के त्याग और परोपकार का वर्णन मिलता है, जिन्होंने नागवंश के एक बालक के प्राणों की रक्षा की थी।
क्षेत्र के तेलिया अफगान, तेलिया शुक्ला, मईल, बलिया उत्तर और बलिया दक्षिण सहित विभिन्न घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही। माताएं अपने निजी साधनों, दोपहिया वाहनों और ई-रिक्शा के माध्यम से घाटों तक पहुंचीं। पूजन के दौरान दान-दक्षिणा देकर परिवार की खुशहाली की कामना भी की।
वहीं, सरयू नदी में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए थे। नदी किनारे बांस-बल्ली लगाकर बैरिकेडिंग की गई थी, ताकि श्रद्धालु निर्धारित सीमा से आगे गहरे पानी में स्नान के लिए न जाएं। बाढ़ के बावजूद माताओं की अटूट श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी।

























































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