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जीवित्पुत्रिका (जिउतिया/जितिया) व्रत : मातृ-संकल्प, जीवन-रक्षा और करुणा की सनातन परम्परा

देवरिया। सनातन परम्परा में जीवित्पुत्रिका व्रत—जिसे लोकभाषाओं में जितिया, जिउतिया अथवा जीवत्पुत्रिका कहा जाता है—मातृत्व की तपस्या, संतान के प्रति मंगलकामना और जीवन-रक्षा के संकल्प का अत्यंत मार्मिक पर्व है। एक आवश्यक तिथिगत बात यह है कि इसके शास्त्रीय उल्लेख सामान्यतः आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से जुड़े मिलते हैं, न कि भाद्र मास से; यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों और पंचांग-परम्पराओं में मास-निर्णय तथा आचार में भिन्नता दिखाई देती है। भविष्य-परम्परा में इसे प्रदोषव्यापिनी अष्टमी से भी जोड़ा गया है। इस व्रत का मूल भाव केवल पुत्र-प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवित संतान की दीर्घायु, आरोग्य, संकटों से रक्षा और कुल-मंगल की कामना है। व्रती माताएँ कठोर उपवास, अनेक स्थानों पर निर्जल व्रत, पूजा, कथा-श्रवण और जितिया धारण के माध्यम से अपनी संतान के लिए मंगल-संकल्प करती हैं। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिला सहित अनेक क्षेत्रों में यह पर्व आज भी गहरी लोक-आस्था का अंग है। 
 ब्रत का पौराणिक आधार : जीमूतवाहन का अद्वितीय त्याग::
     जीवित्पुत्रिका की सबसे प्रसिद्ध कथा राजा जीमूतवाहन से संबद्ध है। कथा के अनुसार उन्होंने एक नागमाता को अपने पुत्र शंखचूड़ को गरुड़ के लिए बलि देने के दुःख में विलाप करते देखा। मातृ-वेदना से द्रवित होकर जीमूतवाहन ने स्वयं को उस नागपुत्र के स्थान पर प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ जब उन्हें ले जाने लगे, तब जीमूतवाहन ने अपना वास्तविक परिचय दिया। उनके अद्भुत परोपकार और आत्मत्याग से प्रभावित होकर गरुड़ ने उन्हें जीवनदान दिया और नागों की बलि न लेने का वर प्रदान किया। कथा की यही आत्मा है—अपने जीवन से बढ़कर दूसरे के जीवन को मूल्य देना। भविष्य-परम्परा में व्रत का उद्देश्य इस प्रकार व्यक्त होता है—
“आश्विने कृष्णपक्षे तु या भवेदष्टमी तिथिः।
शालिवाहनराजस्य पुत्रं जीमूतवाहनम्॥”
  अर्थात् आश्विन कृष्ण अष्टमी को राजा शालिवाहन के पुत्र जीमूतवाहन की पूजा का विधान बताया गया है। इसी परम्परा में आगे कहा गया है—
“योषितः पूजयन्ति स्म शालिवाहनपुत्रकम्।
जीमूतवाहनं जीवत्पुत्रकामाः सहर्षिताः॥”
     अर्थात् संतान के जीवन-मंगल की कामना करने वाली स्त्रियाँ श्रद्धापूर्वक जीमूतवाहन का पूजन करती हैं। 
व्रत का सांस्कृतिक अर्थ::
    इस कथा में जीमूतवाहन केवल किसी देवता के रूप में नहीं, बल्कि करुणा, त्याग और परहित के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। एक माँ अपने पुत्र के जीवन के लिए उपवास करती है और कथा में एक पुरुष दूसरे की संतान के प्राणों की रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित करता है—इन दोनों भावों का संगम जीवित्पुत्रिका को विशिष्ट बनाता है।व्रत से जुड़ी चील और सियारिन की लोककथा भी इसकी सांस्कृतिक स्मृति का महत्त्वपूर्ण भाग है। चील और सियारिन द्वारा व्रत करने की कथा के माध्यम से लोकपरम्परा व्रत की निष्ठा, संयम और संकल्प की पूर्णता का संदेश देती है। इस प्रकार शास्त्रीय आख्यान और लोककथा मिलकर पर्व को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहने देते, बल्कि उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली सांस्कृतिक स्मृति बना देते हैं। 
मातृत्व की तपस्या::
     जीवित्पुत्रिका का सबसे भावपूर्ण पक्ष है—माँ का मौन तप। इसमें कोई व्यक्तिगत वैभव या सांसारिक उपलब्धि प्रधान नहीं; माँ स्वयं कष्ट सहकर संतान के लिए मंगल माँगती है। यही कारण है कि लोकमानस में यह व्रत मातृ-प्रेम की चरम अभिव्यक्ति माना गया है।इसकी आध्यात्मिक शिक्षा भी व्यापक है—जीवन की रक्षा, करुणा, संयम, परोपकार और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व। जीमूतवाहन की कथा यह स्मरण कराती है कि धर्म केवल पूजा में नहीं, बल्कि दूसरे के प्राण और पीड़ा को अपना समझने में भी निहित है।
   अतः जीवित्पुत्रिका व्रत सनातन संस्कृति में मातृ-स्नेह का ऐसा उज्ज्वल दीप है, जिसमें व्रत तपस्या है, कथा करुणा है, जीमूतवाहन त्याग के प्रतीक हैं और संतान के लिए माँ की प्रार्थना जीवन के प्रति अटूट आस्था। यही कारण है कि शताब्दियों के परिवर्तन के बाद भी जिउतिया की परम्परा लोकजीवन में जीवित है—माँ के हृदय से निकली उस मंगलकामना की तरह, जो कहती है: मेरी संतान स्वस्थ रहे, दीर्घायु हो, संकटों से सुरक्षित रहे और उसका जीवन धर्म, सदाचार तथा सुख से प्रकाशित हो।


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