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रुपये वालों की बोलबाला, सफेद चोला देश को बचाना हमारा — आखिर कब जागेगा समाज?

संपादकीय।आज के दौर में राजनीति, सामाजिक व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन को देखकर एक सवाल बार-बार सामने आता है—क्या समाज में व्यक्ति की पहचान उसके चरित्र, ईमानदारी और सेवा से होनी चाहिए या फिर उसकी पहचान उसके पैसे और प्रभाव से तय होगी?

कभी राजनीति और सार्वजनिक जीवन का अर्थ जनसेवा माना जाता था। साधारण जीवन जीने वाला व्यक्ति भी अपने विचारों, संघर्ष और ईमानदारी के दम पर समाज में सम्मान प्राप्त करता था। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। आज कई जगह ऐसा महसूस होता है कि जिसके पास पैसा और प्रभाव अधिक है, उसकी आवाज उतनी ही बुलंद है।

यही वह स्थिति है, जहां सवाल उठता है—“रुपये वालों की बोलबाला, सफेद चोला।”

सफेद कपड़ा अपने आप में ईमानदारी का प्रमाण नहीं है। असली सफेदी व्यक्ति के कपड़ों में नहीं, बल्कि उसके विचारों, आचरण और नीयत में होनी चाहिए। समाज को यह समझना होगा कि बाहरी चमक-दमक और वास्तविक चरित्र में बहुत बड़ा अंतर हो सकता है।

पैसा साधन है, मंजिल नहीं

धन जीवन की आवश्यकता है। व्यापार हो, नौकरी हो या राजनीति—आर्थिक संसाधनों की अपनी भूमिका है। लेकिन जब पैसा ही योग्यता का प्रमाण और प्रभाव का सबसे बड़ा आधार बन जाए, तब लोकतांत्रिक और सामाजिक मूल्यों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अगर किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत उसका पैसा है और उसके पास विचार, संवेदना तथा जनता के प्रति जिम्मेदारी नहीं है, तो केवल आर्थिक ताकत के आधार पर उसे समाज का मार्गदर्शक मान लेना खतरनाक हो सकता है।

समाज को यह तय करना होगा कि वह पैसे के पीछे चलेगा या सिद्धांतों के पीछे।

सफेद चोले के पीछे छिपा चेहरा

सफेद चोला भारतीय समाज में लंबे समय से सादगी और शुचिता का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन कपड़े किसी के चरित्र की गारंटी नहीं होते।

आज जरूरत इस बात की है कि हम व्यक्ति के पहनावे से ज्यादा उसके काम को देखें। उसके भाषण से ज्यादा उसके व्यवहार को देखें। उसके वादों से ज्यादा उसके पुराने कार्यों का मूल्यांकन करें।

जो जनता के बीच दिखाई देता है, वही जरूरी नहीं कि जनता के लिए काम भी करता हो।

सवाल किसी एक व्यक्ति या किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। यह सवाल पूरी व्यवस्था और हमारी सामाजिक सोच का है।

दोष केवल नेताओं का नहीं

हम अक्सर व्यवस्था को दोष देते हैं, नेताओं को दोष देते हैं और भ्रष्टाचार को दोष देते हैं। लेकिन हमें अपने भीतर भी झांकना होगा।

जब हम जाति, धर्म, व्यक्तिगत लाभ, पैसे, प्रभाव या छोटी-छोटी सुविधाओं के आधार पर अपना निर्णय लेने लगते हैं, तब हम स्वयं उस व्यवस्था को मजबूत करते हैं जिसकी शिकायत बाद में करते हैं।

लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है। जनता लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।

अगर मतदाता अपने वोट की कीमत समझ ले, उम्मीदवार के चरित्र और कार्यों की जांच करे और किसी लालच में निर्णय न ले, तो राजनीति की दिशा बदल सकती है।

देश किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं

देश किसी नेता, अधिकारी, व्यापारी, उद्योगपति या किसी एक संगठन का नहीं है। देश करोड़ों आम नागरिकों का है।

किसान खेत में मेहनत करता है, मजदूर निर्माण करता है, शिक्षक भविष्य तैयार करता है, जवान सीमा की रक्षा करता है और पत्रकार समाज के सामने सवाल रखता है।

इन सभी की मेहनत से देश आगे बढ़ता है।

इसलिए देश को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। देश को बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी है।

देश तब मजबूत होगा जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझेंगे।

पत्रकारिता की जिम्मेदारी भी बड़ी है

जब पैसा और प्रभाव सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने लगें, तब निष्पक्ष पत्रकारिता की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

पत्रकार का काम किसी व्यक्ति का प्रचार करना नहीं, बल्कि सवाल पूछना है। जहां जनता की समस्या हो, वहां आवाज उठाना है। जहां व्यवस्था अच्छी हो, वहां उसकी सराहना करना है और जहां कमी हो, वहां तथ्य के साथ सवाल करना है।

पत्रकारिता को न किसी के दबाव में झुकना चाहिए और न किसी के प्रभाव में बिकना चाहिए।

कलम की ताकत उसकी स्वतंत्रता में है।

हमें कैसा समाज चाहिए?

हमें ऐसा समाज चाहिए जहां गरीब की आवाज भी सुनी जाए और अमीर की जिम्मेदारी भी तय हो।

जहां पद से ज्यादा योग्यता का सम्मान हो।

जहां कपड़ों से ज्यादा चरित्र देखा जाए।

जहां पैसे से ज्यादा ईमानदारी की कीमत हो।

जहां राजनीति में सेवा का भाव हो और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही हो।

और सबसे महत्वपूर्ण—जहां आम आदमी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने से डरे नहीं।

देश बचाना नारा नहीं, जिम्मेदारी है

“देश को बचाना हमारा” केवल एक नारा नहीं होना चाहिए। यह हमारे व्यवहार का हिस्सा बनना चाहिए।

हम अफवाहों से बचें, तथ्य की जांच करें, गलत को गलत कहने का साहस रखें, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें, कानून का सम्मान करें और अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाएं।

हमें यह समझना होगा कि देश केवल सीमा पर नहीं बचाया जाता। देश स्कूल में भी बचाया जाता है, अस्पताल में भी बचाया जाता है, सड़क पर भी बचाया जाता है, खेत में भी बचाया जाता है और न्याय के लिए उठी एक ईमानदार आवाज में भी बचाया जाता है।

रुपये वालों की बोलबाला हो सकती है, लेकिन हमेशा नहीं। सफेद चोले की चमक हो सकती है, लेकिन असली पहचान अंततः कर्मों से ही होगी।

समय आ गया है कि समाज चेहरों से आगे बढ़कर चरित्र को देखे, वादों से आगे बढ़कर काम को देखे और प्रभाव से आगे बढ़कर सत्य को पहचाने।

क्योंकि—

देश किसी पैसे वाले का नहीं, देश हर नागरिक का है।
देश को बचाना किसी एक की जिम्मेदारी नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है।

— संपादक चंद्रशेखर मौर्य


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