संपादकीय नेताओं की भूमिका से मुक्त हो भ्रष्टाचार, तभी फिर बन सकता है भारत ‘सोने की चिड़िया’ | GGS NEWS 24
संपादकीय: भारत को कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। आज भी देश के पास प्राकृतिक संसाधन, प्रतिभा, विशाल बाजार, मेहनतकश युवा और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की क्षमता है। सवाल यह है कि इतनी संभावनाओं के बावजूद विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में इतनी बाधाएं क्यों आती हैं?
इस सवाल का एक बड़ा जवाब है—भ्रष्टाचार।
भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने-देने तक सीमित नहीं है। जब किसी सरकारी काम के लिए कमीशन तय हो, जब ठेके में गुणवत्ता से ज्यादा पहुंच मायने रखे, जब योजनाओं का पैसा बीच रास्ते में ही कमजोर पड़ जाए और जब राजनीतिक संरक्षण के आरोप बार-बार सामने आएं, तब यह समस्या किसी एक कर्मचारी की नहीं रह जाती। यह पूरी व्यवस्था की बीमारी बन जाती है।
आजमगढ़ से देश तक उठता एक बड़ा सवाल
आजमगढ़ जैसे जिलों में सड़क, नाली, बिजली, आवास, पंचायत, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास योजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है—जिस काम के लिए सरकार पैसा जारी करती है, क्या वह पैसा जमीन पर उसी काम में पूरी तरह दिखाई देता है?
कहीं सड़क बनने के कुछ महीनों बाद टूट जाती है, कहीं नाली निर्माण अधूरा रह जाता है, कहीं सरकारी भवन वर्षों तक उपयोग में नहीं आता। हर मामले को भ्रष्टाचार कहना उचित नहीं होगा, लेकिन जहां भी सरकारी धन के दुरुपयोग, अनियमितता या कमीशनखोरी की शिकायत हो, वहां निष्पक्ष जांच क्यों न हो?
जनता को केवल घोषणा नहीं चाहिए। उसे काम की गुणवत्ता और खर्च हुए पैसे का हिसाब चाहिए।
घोटाले चाहे छोटे हों या बड़े, नुकसान जनता का
देश ने समय-समय पर बड़े वित्तीय घोटालों और भ्रष्टाचार के मामलों को देखा है। इन मामलों ने एक बात स्पष्ट की है कि भ्रष्टाचार का वास्तविक नुकसान सरकारी खजाने का ही नहीं, बल्कि आम नागरिक के विश्वास का भी होता है।
एक रुपये की अनियमितता भी महत्वपूर्ण है और हजारों करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी भी। रकम छोटी-बड़ी हो सकती है, लेकिन सिद्धांत एक ही है—जनता के पैसे की जिम्मेदारी जनता के प्रति होनी चाहिए।
कमीशनखोरी की संस्कृति विकास की गति को भी प्रभावित करती है। यदि किसी परियोजना की वास्तविक लागत से अधिक धन खर्च हो और गुणवत्ता घट जाए, तो दोहरा नुकसान होता है—सरकारी धन भी जाता है और जनता को बेहतर सुविधा भी नहीं मिलती।
राजनीति पर सवाल, लेकिन बिना सबूत किसी पर आरोप नहीं
यह कहना गलत होगा कि हर राजनेता भ्रष्ट है या हर सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार में शामिल है। देश में हजारों जनप्रतिनिधि और अधिकारी ईमानदारी से काम कर रहे हैं।
लेकिन जहां किसी मामले में राजनीतिक संरक्षण, कमीशनखोरी या भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं, वहां जांच एजेंसियों को निष्पक्षता से जांच करनी चाहिए। दोषी कोई भी हो—नेता, अधिकारी, ठेकेदार या बिचौलिया—कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
लोकतंत्र में सत्ता का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही भी है।
कमीशनखोरी खत्म करने का रास्ता क्या?
भ्रष्टाचार पर केवल भाषण देने से लड़ाई नहीं जीती जा सकती। इसके लिए व्यवस्था में पारदर्शिता लानी होगी।
सरकारी ठेकों की प्रक्रिया पारदर्शी हो, काम की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हो, भुगतान से पहले वास्तविक कार्य का सत्यापन हो और शिकायत करने वाले नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
इसके साथ ही सरकारी योजनाओं में डिजिटल निगरानी, सार्वजनिक ऑडिट, सोशल ऑडिट और खर्च का खुला विवरण भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगा सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात—भ्रष्टाचार करने वाले को राजनीतिक संरक्षण मिलने की धारणा खत्म करनी होगी।
जनता भी पूछे—मेरा पैसा कहां खर्च हुआ?
लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है। वह सरकार को धन उपलब्ध कराने वाली करदाता भी है और सरकार से हिसाब मांगने का अधिकार रखने वाली नागरिक भी।
हर नागरिक को पूछना चाहिए—
मेरे गांव की सड़क पर कितना पैसा खर्च हुआ?
नाली के निर्माण की लागत कितनी थी?
सरकारी भवन पर कितना बजट आया?
काम किस ठेकेदार ने किया?
गुणवत्ता की जांच किसने की?
जब जनता सवाल पूछना शुरू करेगी और प्रशासन उन सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य होगा, तभी व्यवस्था में वास्तविक बदलाव आएगा।
भारत को फिर ‘सोने की चिड़िया’ बनाने का रास्ता
भारत को फिर मजबूत और समृद्ध बनाने के लिए केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। ईमानदार व्यवस्था, पारदर्शी शासन और जवाबदेह राजनीति भी उतनी ही जरूरी है।
नेताओं की भूमिका लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए उनसे सबसे अधिक अपेक्षा भी होनी चाहिए। यदि राजनीति में ईमानदारी मजबूत होगी, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई निष्पक्ष होगी और सरकारी धन का एक-एक रुपया जनता के हित में खर्च होगा, तो भारत की विकास यात्रा को कोई रोक नहीं सकता।
भारत के पास संसाधन हैं, प्रतिभा है और सामर्थ्य है। जरूरत केवल ऐसी व्यवस्था की है जिसमें कमीशन से ज्यादा काम की गुणवत्ता, सिफारिश से ज्यादा योग्यता और भ्रष्टाचार से ज्यादा ईमानदारी की कीमत हो।
क्योंकि—
“जिस दिन जनता के पैसे का पूरा हिसाब मिलने लगेगा, उसी दिन विकास का असली अर्थ दिखाई देने लगेगा।”
— संपादकीय डेस्क, GGS NEWS 24



























































Leave a comment