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कोचिंग और लाइब्रेरी उद्योग की अव्यवस्था: कब जागेगा प्रशासन?

देवरिया।प्रदेश के छोटे कस्बों, बाजारों, चौराहों और बड़े महानगरों तक आज कोचिंग संस्थानों का जाल तेजी से फैल चुका है। शिक्षा के नाम पर यह एक विशाल व्यवसाय का रूप ले चुका है, जिसमें हजारों करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं और बेहतर भविष्य की उम्मीद में लाखों छात्र इन संस्थानों का रुख करते हैं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अधिकांश स्थानों पर छात्रों की सुरक्षा, सुविधाओं और मानकों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है. स्थिति यह है कि कई कोचिंग संस्थान बेसमेंट, संकरी गलियों और छोटे-छोटे कमरों में संचालित हो रहे हैं। क्षमता से कई गुना अधिक छात्रों को एक ही कमरे में बैठाया जाता है। अग्निशमन व्यवस्था, आपातकालीन निकास, वेंटिलेशन, प्रकाश, स्वच्छता और भवन सुरक्षा जैसे बुनियादी मानकों को ताक पर रख दिया जाता है। बच्चों को मानो भेड़-बकरियों की तरह ठूंसकर बैठाया जाता है। ऐसे में आग लगने, भवन ध्वस्त होने या किसी अन्य दुर्घटना की स्थिति में भारी जनहानि की आशंका बनी रहती है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुई घटनाओं ने इस खतरे को बार-बार उजागर किया है, लेकिन प्रशासनिक तंत्र की सक्रियता अक्सर केवल हादसों के बाद ही दिखाई देती है।
कोचिंग संस्थानों की तरह हाल के वर्षों में लाइब्रेरी व्यवसाय भी तेजी से बढ़ा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए निजी लाइब्रेरी एक बड़े उद्योग के रूप में उभरी हैं। लेकिन यहाँ भी हालात कम चिंताजनक नहीं हैं। अधिकांश लाइब्रेरी बिना किसी स्पष्ट नियमन के संचालित हो रही हैं। तंग कमरों में सैकड़ों छात्रों को बैठाया जाता है। अग्निशमन यंत्र, आपातकालीन निकास, पर्याप्त शौचालय, स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्यकर वातावरण जैसी सुविधाएँ या तो अनुपस्थित हैं या केवल कागजों में मौजूद हैं। कई स्थानों पर विद्युत व्यवस्था भी बेहद खराब होती है, जो दुर्घटनाओं को निमंत्रण देती है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि आखिर इन संस्थानों को संचालित करने की अनुमति कैसे मिल जाती है? क्या स्थानीय प्रशासन, नगर निकाय, विकास प्राधिकरण और शिक्षा विभाग अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं? यदि नियम मौजूद हैं तो उनका पालन क्यों नहीं कराया जा रहा? यदि नियम अपर्याप्त हैं तो उन्हें तत्काल सख्त बनाने की आवश्यकता है।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल दुर्घटना के बाद जांच बैठाने और दोषियों पर कार्रवाई करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक कोचिंग संस्थान और लाइब्रेरी का नियमित निरीक्षण हो। भवन सुरक्षा प्रमाणपत्र, अग्निशमन विभाग की अनापत्ति, क्षमता निर्धारण, सीसीटीवी व्यवस्था और आपातकालीन निकास जैसी शर्तों का कठोरता से पालन कराया जाए। बिना मानकों को पूरा किए किसी भी संस्थान को संचालन की अनुमति न दी जाए।
इसके साथ ही छात्रों और अभिभावकों को भी जागरूक बनाने की आवश्यकता है। केवल नाम, विज्ञापन और सफलता के दावों के आधार पर संस्थान चुनने के बजाय सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का भविष्य बनाना है, उन्हें जोखिम में डालना नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार कोचिंग और लाइब्रेरी क्षेत्र के लिए एक स्पष्ट और कठोर नियामक ढांचा तैयार करे। नियमित निरीक्षण, पारदर्शी लाइसेंसिंग व्यवस्था और नियमों के उल्लंघन पर कठोर दंड सुनिश्चित किए जाएँ। अन्यथा शिक्षा के नाम पर चल रहा यह अनियंत्रित व्यवसाय किसी बड़े हादसे का कारण बनता रहेगा और हर दुर्घटना के बाद वही सवाल गूंजता रहेगा—क्या प्रशासन किसी और त्रासदी का इंतजार कर रहा था?
शिक्षा का वातावरण सुरक्षित, व्यवस्थित और मानक आधारित होना चाहिए। यह केवल संस्थान संचालकों की नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन की भी संवैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी है। जब तक इस जिम्मेदारी का गंभीरता से निर्वहन नहीं होगा, तब तक लाखों छात्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही बनी रहेगी।


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