विवेक जाखड़ की एक कविता ने पाठकों के छाई जुबां पर
नई दिल्ली : कलम की ताकत ने हमेशा से ही राज किया है और आज भी राज कर रहा है और कल भी राज करेगा अगर इस कलम को विवेक की तरह हर कोई अपने दिल की धड़कन को जुबां की कागज़ पर सज़ा दे तो चार चांद लगाने की बात हो जाए आईए आप सभी पाठकों को बताए कि, 27 साल के हुए दिल्ली के रहने वाले विवेक जाखड़, गूगल इंडिया के लिए करते थे काम...पेशे से यूट्यूबर और लेखक भी हैं। आज उनकी एक विशेष कविता GGS NEWS 24 के पाठकों और देश विदेश में हिन्दी साहित्य से जुड़े तमाम पाठकों के लिए विशेष तौर से प्रकाशित किया जा रहा है .....
दिल तोड़के तुम्हे भूल भी जाऊंगा
कुछ यूं मैं तुमसे दूर ही जाऊंगा
वहम में हो की तुम्हे याद करूंगा
किसी और के साथ वही लम्हे जी भी जाऊंगा
लम्हे वही जो तुम्हे सुनहरे लगते थे
जो बस तुम्हे तेरे मेरे लगते थे
मैं तो भंवरा हूं मुझे प्यार ना करना
मेरे झूठे वादों पर तुम एतबार ना करना
शौंक है मेरा कली कली मंडराना
तुम कभी मुझसे इजहार ना करना
हुआ था मुझे भी प्यार तबसे टूटा हुआ हूं मैं
चाहिए था जिनका साथ उनसे छूटा हुआ हूं मैं
झांकके देखा जब अपने ही गिरेबान में मैंने
तबसे खुदसे तुमसे ज्यादा रूठा हुआ हूं मैं
दोस्ती इश्क फिर दगा , ताउम्र बस यही करता आया हूं
अपने फायदे के लिए लोगों पर मरता आया हूं
झूठ वो भी था की टूटा मेरा एक रोका था
असल में मुझे भी मिला कभी धोखा था
और कितना ही सच बताऊं अपने बारे में
रोया नहीं कभी सोच तेरे बारे में
दराज में रखी किताब खोल पढ़ लेना
असल में जान जाओगे मेरे बारे में
अब तुम पूछोगे वो दराज है कहां
जहां तुम बस्ती थी जगह है वहां
झूठ फरेब से बने महल के नीचे
एक छोटा सा सच का कमरा है जहां
उस कमरे में तुम्हे एक तयखाना मिलेगा
वहां तुम्हे मेरा गुम हुआ जमाना मिलेगा
जो गुम हो गई थी तुम्हारी पाजेब एक दफा
उस पाजेब का एक टुकड़ा पुराना मिलेगा
वो टुकड़ा उधार है तुम्हारा मेरे ऊपर
सच में कभी मरता था जिसके ऊपर
वापस आना हो तो बस इशारा कर देना
वही छज्जे पर पुराने जंगल के ऊपर।





















































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