गृहस्थ जीवन की आधारशिला है पति-पत्नी का समन्वय : आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी
देवरिया। गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के पारस्परिक प्रेम, समर्पण और समन्वय का विशेष महत्व है। गृहस्थ जीवन की सुख-शांति और पारिवारिक व्यवस्था में पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी ने कहा कि गृहस्थ के घर की अनेक क्रियाओं और व्यवस्थाओं का मूल उसकी गृहिणी होती है।
श्रीब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृतिखण्ड, अध्याय-59 के श्लोक 21, 22 और 23 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—
“भार्यामूला: क्रिया सर्वा भार्यामूला गृहास्तथा।
भार्यामूलं सुखं सर्वं गृहस्थानां ग्रहे सदा।।
भार्यामूलः सदा हर्षो भार्यामूलं च मंगलम्।
भार्यामूलश्च संसारो भार्यामूलं च सौरभम्।।
यथा रथश्च रथीनां गृहिणां च तथा गृहम्।
सारथिस्तु यथा तेषां गृहिणां च तथा प्रिया।। ”
इन श्लोकों की व्याख्या करते हुए आचार्य त्रिपाठी ने कहा कि गृहस्थ के घर की व्यवस्था, सुख, हर्ष और मंगल में पत्नी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। जिस प्रकार रथ के संचालन में सारथी की भूमिका होती है, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन की दैनिक व्यवस्था को व्यवस्थित रखने में गृहिणी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि सुखी और समृद्ध गृहस्थ जीवन के लिए पति-पत्नी को एक-दूसरे के साथ मिलकर परिवार का संचालन करना चाहिए। केवल पत्नी ही नहीं, बल्कि पति की भी उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी के साथ प्रेम, सम्मान और सहयोग का व्यवहार करे।
आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी ने कहा कि पति-पत्नी के बीच निश्छल प्रेम, परस्पर सम्मान, समर्पण और समन्वय सुखी परिवार की आधारशिला हैं। गृहस्थ जीवन में किसी एक पक्ष के प्रयास से स्थायी सुख-शांति की कल्पना कठिन है। दोनों के सहयोग और सामंजस्य से ही परिवार में हर्ष, मंगल और शांति का वातावरण कायम रह सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि स्त्रियों को पति के साथ समन्वय स्थापित करते हुए गृहस्थी के संचालन में अपना योगदान देना चाहिए, वहीं पुरुषों को भी पत्नी के योगदान और महत्व को समझते हुए उसका सम्मान एवं सहयोग करना चाहिए।
आचार्य त्रिपाठी के अनुसार पति-पत्नी का आपसी विश्वास और सहयोग परिवार को मजबूती प्रदान करता है। गृहस्थ जीवन में प्रेम के साथ कर्तव्यबोध और समन्वय ही परिवार की वास्तविक शक्ति है।


























































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