रामचरितमानस भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर : डॉ. मदन मोहन मिश्र
•तुलसी जयंती पर प्रतापपुर में श्रीरामकथा का आयोजन, श्रद्धालुओं ने लिया राम के आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प
कादीपुर सुलतानपुर । गोस्वामी तुलसीदास की जयंती के अवसर पर प्रतापपुर में श्रीरामकथा का आयोजन श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में किया गया। कथा के दौरान प्रसिद्ध रामकथा वाचक डॉ. मदन मोहन मिश्र ने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन, कृतित्व और श्रीरामचरितमानस की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जो समाज को भक्ति के साथ-साथ मर्यादा, संस्कार, सदाचार और कर्तव्यबोध की सीख देती है।
डॉ. मदन मोहन मिश्र ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र को जन-जन तक पहुंचाकर भारतीय समाज को जीवन जीने की ऐसी राह दिखाई, जिसमें सत्य, त्याग, सेवा, करुणा और मर्यादा का समन्वय है। श्रीराम का चरित्र केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवन के आदर्शों की प्रेरणा है।
उन्होंने कहा कि श्रीरामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों, सामाजिक समरसता और मानवीय आदर्शों का अनुपम ग्रंथ है। इसमें परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति व्यक्ति के कर्तव्यों को सहज भाषा में समझाया गया है। यही कारण है कि सदियों बाद भी मानस की प्रासंगिकता बनी हुई है।
रामकथा वाचक ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी अद्भुत लेखनी के माध्यम से रामकथा को जन-जन की आस्था से जोड़ दिया। उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ जीवन-दर्शन भी समाहित है। उन्होंने कठिन आध्यात्मिक और नैतिक संदेशों को सरल लोकभाषा में प्रस्तुत किया, जिससे समाज के हर वर्ग तक उनकी वाणी पहुंच सकी।
नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ने पर जोर
डॉ. मिश्र ने कहा कि वर्तमान समय में सामाजिक जीवन तेजी से बदल रहा है। ऐसे दौर में परिवार और समाज में संस्कार, सद्भाव तथा नैतिक मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता और बढ़ गई है। नई पीढ़ी को भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र और तुलसीदास की शिक्षाओं से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण जरूरत है।
उन्होंने कहा कि परिवारों में नियमित रूप से रामचरितमानस का पाठ किया जाए और बच्चों को उसके प्रसंगों तथा आदर्शों से परिचित कराया जाए तो उनके व्यक्तित्व निर्माण में सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। श्रीराम का जीवन हमें परिस्थितियां कैसी भी हों, सत्य और कर्तव्य के मार्ग से विचलित न होने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि तुलसी जयंती को केवल स्मृति दिवस के रूप में मनाने के बजाय गोस्वामी तुलसीदास के बताए मार्ग को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। विनम्रता, सेवा, सत्य, भक्ति और सदाचार को जीवन का हिस्सा बनाना ही तुलसीदास के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जय श्रीराम के जयघोष से गूंजा पंडाल
श्रीरामकथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति में सराबोर नजर आए। कथा के बीच-बीच में ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने गोस्वामी तुलसीदास को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उनकी शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने और भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के अंत में व्यासपीठ का सुरेश उपाध्याय और संजय उपाध्याय ने आरती एवं माल्यार्पण कर स्वागत किया। कार्यक्रम में प्रमोद मिश्र, विवेक पांडेय, अम्बरीश मिश्र, विनोद कुमार, हरिराम दूबे, वंशबहादुर सिंह, पवन कुमार उपाध्याय, देवी प्रसाद पांडेय, रामचंद्र यादव, विजय उपाध्याय समेत बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।




























































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