फीस वसूली में ‘फास्ट ट्रैक’, भुगतान में ‘पांच साल का ब्रेक’!
•डीडीयू विश्वविद्यालय में दोहरे नियम का आरोप: कॉलेज देर करें तो विलंब शुल्क, शिक्षकों के बकाये पर वर्षों से इंतजार
दीक्षांत मंच से कुलपति ने कॉलेजों की लेटलतीफी गिनाई, पर परीक्षा पारिश्रमिक के लंबित भुगतान पर सवाल अनुत्तरित।
देवरिया।दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की वित्तीय कार्यशैली पर अब सवाल और तीखे हो गए हैं। 6 अगस्त के दीक्षांत समारोह में कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने राज्यपाल एवं कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल के सामने एडेड कॉलेजों द्वारा विद्यार्थियों से शुल्क वसूलने के बाद उसे विश्वविद्यालय में समय से जमा न करने और विलंब शुल्क से बचने के लिए छूट मांगने की बात रखी।लेकिन इसी मंच से एक बड़ा सवाल गायब रहा—जब विश्वविद्यालय शुल्क वसूलने में समय की इतनी पाबंदी चाहता है, तो अपने ही दायित्वों के भुगतान में वर्षों की देरी क्यों?
कॉलेज की देरी पर जुर्माना, विश्वविद्यालय की देरी पर क्या?
शिक्षकों और संबद्ध महाविद्यालयों की ओर से लंबे समय से यह आरोप उठता रहा है कि उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन, प्रश्नपत्र सेटिंग, यात्रा भत्ता और अन्य परीक्षा संबंधी कार्यों का पारिश्रमिक वर्षों से लंबित है। कुछ देयकों के करीब पांच वर्ष पुराने होने की बात कही जा रही है।यानी परीक्षा कार्य समय पर चाहिए, मूल्यांकन समय पर चाहिए, परिणाम समय पर चाहिए—लेकिन काम करने वाले शिक्षक को भुगतान कब मिलेगा, इसकी समयसीमा मानो विश्वविद्यालयी कैलेंडर में दर्ज ही नहीं!
दूसरी तरफ महाविद्यालय शुल्क जमा करने में देर करें तो विलंब शुल्क का प्रावधान।सवाल सीधा है—विश्वविद्यालय भुगतान में देर करे तो उस पर क्या दंड है?
‘आश्वासन’ की बोतल, बकाये की प्यास बरकरार!
शिक्षकों का कहना है कि जब वे लंबित पारिश्रमिक को लेकर आवाज उठाते हैं या आंदोलन का रास्ता अपनाते हैं तो उन्हें भुगतान का भरोसा दिया जाता है। मगर भरोसे और भुगतान के बीच की दूरी कब खत्म होगी, इसका जवाब स्पष्ट नहीं है।पांच साल पुराने बकाये के सामने आश्वासन कितना बड़ा भुगतान है?
शिक्षक ने परीक्षा कार्य किया।
उत्तर पुस्तिकाएं जांचीं।
प्रश्नपत्र तैयार किए।
यात्रा की।
विश्वविद्यालय का परीक्षा तंत्र चलाने में सहयोग दिया।अब उसका पारिश्रमिक मांगना कोई उपकार नहीं, उसका अधिकार है।
कुलपति से पांच सीधे सवाल
1. यदि महाविद्यालयों से शुल्क समय पर जमा कराना अनिवार्य है, तो शिक्षकों के परीक्षा पारिश्रमिक के भुगतान की समयसीमा क्यों नहीं?
2. वर्षों से लंबित देयकों की कुल राशि कितनी है?
3. कितने शिक्षकों और महाविद्यालयों का भुगतान लंबित है और सबसे पुराना बकाया कितने वर्ष पुराना है?
4. भुगतान में देरी के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर किस अधिकारी या व्यवस्था की जवाबदेही तय की गई?
5. क्या विश्वविद्यालय अपने लंबित भुगतान के लिए भी कोई विलंब शुल्क अथवा क्षतिपूर्ति व्यवस्था लागू करने पर विचार करेगा?
दीक्षांत का आईना दोनों तरफ होना चाहिए
महाविद्यालयों की कमियां बताना गलत नहीं है। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन से भी यही अपेक्षा है कि वह अपने हिस्से की जवाबदेही स्वीकार करे।आईना ऐसा हो जिसमें कॉलेजों की देरी भी दिखे और विश्वविद्यालय के वर्षों पुराने बकाये भी।
राज्यपाल के सामने यदि शुल्क जमा न करने वाले कॉलेजों की बात पहुंची, तो क्या विश्वविद्यालय के लंबित भुगतान की फाइल भी उनके संज्ञान में नहीं आनी चाहिए?
क्योंकि सवाल केवल पैसे का नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें पैसा लेने के लिए तारीख तय है, लेकिन पैसा देने की तारीख अनिश्चित।
अब आश्वासन नहीं, भुगतान की तारीख चाहिए
विश्वविद्यालय प्रशासन यदि वास्तव में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन के प्रति गंभीर है तो उसे सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि लंबित परीक्षा पारिश्रमिक का भुगतान कब तक किया जाएगा।
क्योंकि शिक्षक को आश्वासन नहीं, उसका मेहनताना चाहिए।
और विश्वविद्यालय को यह तय करना होगा कि नियम केवल वसूली के लिए हैं या जवाबदेही के लिए भी।फीस में फुर्ती और भुगतान में पांच साल की सुस्ती—यही सवाल अब डीडीयू विश्वविद्यालय की कार्यशैली के सामने सबसे बड़ा आईना बनकर खड़ा है।


























































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