लोकजीवन के सशक्त चितेरे हैं डॉ. सूर्य दीन यादव, हिंदी साहित्य को दिया नई दृष्टि : साहित्येन्दु
•अखिल भारतीय साहित्य परिषद की संगोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्तित्व और कृतित्व पर किया विमर्श, 'सूर्यदीन यादव : आलोचना भावयित्री' ग्रंथ का हुआ लोकार्पण
कादीपुर (सुलतानपुर)। गुजरात में रहकर भी अवध की माटी, लोकजीवन और सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनाओं का आधार बनाने वाले साहित्यकार डॉ. सूर्यदीन यादव का लेखन हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर है। उन्होंने साहित्य को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज के वंचित, उपेक्षित और आम जनजीवन की संवेदनाओं को अपनी लेखनी के माध्यम से सशक्त अभिव्यक्ति दी। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी पाठकों और शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
ये विचार संत तुलसीदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय के पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु' ने व्यक्त किए। वह अखिल भारतीय साहित्य परिषद की ओर से सेंट्रल पब्लिक स्कूल सभागार में आयोजित "डॉ. सूर्यदीन यादव : व्यक्तित्व एवं कृतित्व" विषयक संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि डॉ. सूर्यदीन यादव ने साहित्य में कृत्रिमता का सहारा नहीं लिया, बल्कि जीवन को जैसा देखा और महसूस किया, वैसा ही अपनी रचनाओं में ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया। यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता है। उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. आद्या प्रसाद सिंह 'प्रदीप' ने कहा कि डॉ. सूर्यदीन यादव लोक चेतना से जुड़े साहित्यकार हैं। उनके व्यक्तित्व की सादगी और संवेदनशीलता उनकी प्रत्येक रचना में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। साहित्य तभी जीवंत होता है जब उसमें समाज की धड़कन सुनाई दे और यह गुण उनके साहित्य में भरपूर मौजूद है।
मुख्य वक्ता एवं चर्चित कहानीकार दिनेश प्रताप सिंह 'चित्रेश' ने कहा कि साहित्य में संख्या नहीं, गुणवत्ता का महत्व होता है। लेखक की वास्तविक पहचान उसकी रचनाओं से होती है। डॉ. सूर्यदीन यादव ने अपने लेखन की गुणवत्ता के बल पर हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान बनाया है और उनकी रचनाएं उन्हें समकालीन साहित्यकारों से अलग पहचान दिलाती हैं।
राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह 'रवि' ने कहा कि डॉ. सूर्यदीन यादव केवल कवि, कथाकार, आलोचक और संपादक ही नहीं, बल्कि अत्यंत सहज एवं सरल व्यक्तित्व के धनी भी हैं। उनके व्यक्तित्व की यही सहजता उनके साहित्य को भी मानवीय संवेदनाओं से समृद्ध बनाती है।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के जिला उपाध्यक्ष डॉ. राम प्यारे प्रजापति ने डॉ. सूर्यदीन यादव के जीवन संघर्ष, साहित्यिक यात्रा और प्रमुख कृतियों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने समाज के वंचित वर्ग, ग्रामीण परिवेश और मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखकर साहित्य सृजन किया। उनकी रचनाएं सामाजिक चेतना को नई दिशा देती हैं।
युवा साहित्यकार पवन कुमार सिंह ने कहा कि गुजरात में वर्षों से निवास करने के बावजूद डॉ. सूर्यदीन यादव का मन हमेशा अवध की सांस्कृतिक मिट्टी से जुड़ा रहा। उनकी कहानियों, कविताओं और अन्य रचनाओं में गांव, लोकसंस्कृति और ग्रामीण जीवन की सहज झलक मिलती है।
संगोष्ठी के दौरान "सूर्यदीन यादव : आलोचना भावयित्री" नामक ग्रंथ का विधिवत लोकार्पण भी किया गया। इस ग्रंथ का संपादन डॉ. राम गोपाल सिंह एवं डॉ. राम प्यारे प्रजापति ने किया है। वक्ताओं ने इसे डॉ. सूर्यदीन यादव के साहित्य के अध्ययन और शोध के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया।
कार्यक्रम का संचालन अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष मथुरा प्रसाद सिंह 'जटायु' ने किया, जबकि महामंत्री डॉ. करुणेश भट्ट ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर शिवपूजन यादव, अवनीश पाण्डेय सहित अनेक साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए तथा डॉ. सूर्यदीन यादव के साहित्यिक अवदान की सराहना की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति रही।
























































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