नंगे पांव दौड़ी मां… साड़ी बनी दौड़ की पोशाक, 1600 मीटर में दिखा हौसले का दम
•जूते खरीदने के पैसे नहीं थे, फिर भी नहीं टूटा हौसला; पति की मौत के बाद दो बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही कविता ने मैदान में लिखी संघर्ष की कहानी
रामगढ़, झारखंड।कभी हालात इंसान को तोड़ देते हैं, तो कभी वही हालात उसके भीतर ऐसी ताकत पैदा कर देते हैं, जो दूसरों के लिए मिसाल बन जाती है। झारखंड के रामगढ़ में होमगार्ड भर्ती की शारीरिक परीक्षा के दौरान कविता कुमारी की कहानी कुछ ऐसी ही दिखाई दी।
बताया जा रहा है कि कविता के पास न तो दौड़ने के लिए जूते थे और न ही महंगा ट्रैक सूट। आर्थिक तंगी ऐसी कि परिवार का गुजारा चलाना ही चुनौती है। लेकिन नौकरी पाने और अपने परिवार को संभालने की उम्मीद ने उनके कदम नहीं रुकने दिए। कविता साड़ी पहनकर और नंगे पांव ही 1600 मीटर की दौड़ में उतर गईं।
तपती जमीन पर नंगे पांव दौड़ीं, लक्ष्य था परिवार का सहारा बनना
मैदान में जब दूसरे अभ्यर्थी जूतों और खेलों के कपड़ों में दौड़ रहे थे, तब कविता साड़ी में नंगे पांव दौड़ती नजर आईं। बताया गया कि उन्होंने 1600 मीटर की दौड़ करीब 6 मिनट में पूरी की। उनके लिए यह सिर्फ एक शारीरिक परीक्षा नहीं थी, बल्कि परिवार की जिंदगी बदलने की उम्मीद भी थी।
कविता के पति दीपक महतो गुजरात में काम करते थे। बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। इलाज के दौरान परिवार पर कर्ज का बोझ भी बढ़ गया। पति के जाने के बाद दो छोटे बच्चों और सास-ससुर की जिम्मेदारी कविता के कंधों पर आ गई।
सुबह 4 बजे उठकर दौड़, फिर घर का काम और मजदूरी
सूत्रों के मुताबिक, कविता रोजाना सुबह करीब 4 बजे उठकर दौड़ की तैयारी करती हैं। इसके बाद घर के काम निपटाने के बाद मजदूरी करने जाती हैं। बताया जाता है कि परिवार का पेट पालने के लिए वह ईंट भट्ठे पर मजदूरी भी करती हैं।
जिस महिला के लिए रोजमर्रा की जिंदगी ही संघर्ष है, वही महिला नौकरी की उम्मीद लेकर मैदान में दौड़ रही है। नंगे पांवों की यह दौड़ सिर्फ 1600 मीटर की नहीं, बल्कि गरीबी, मजबूरी और जिंदगी की कठिन परिस्थितियों के खिलाफ एक संघर्ष है।
कविता की दौड़ में दिखी उम्मीद की एक किरण
कविता की तस्वीर और उनकी कहानी सामने आने के बाद लोग उनकी हिम्मत को सलाम कर रहे हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि संसाधनों की कमी सपनों को रोक सकती है, लेकिन हौसला मजबूत हो तो रास्ते निकाले जा सकते हैं।
अब कविता की उम्मीद उनकी मेहनत के परिणाम पर टिकी है। हर किसी की यही दुआ है कि नंगे पांव मैदान में उतरी यह मां सफलता के साथ अपने घर लौटे और अपने बच्चों के भविष्य का सहारा बन सके।
कविता की कहानी उन तमाम युवाओं के लिए भी संदेश है—सुविधाएं कम हो सकती हैं, लेकिन हौसला कम नहीं होना चाहिए।























































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