योगेश्वर श्रीकृष्ण : धर्म, सत्य और निष्काम कर्म का शाश्वत संदेश:::-पूर्व प्राचार्य डॉक्टर अजय कुमार मिश्रा
देवरिया।बरहज ,योगेश्वर श्रीकृष्ण का जीवन केवल एक महान ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व की कथा नहीं है, बल्कि वह धर्म, सत्य, लोककल्याण और निष्काम कर्म की ऐसी जीवन-दृष्टि है, जो युगों से मानवता का मार्गदर्शन करती आ रही है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विषम क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य और धर्म के मार्ग से विमुख नहीं होना चाहिए।
श्रीकृष्ण का जन्म ही अत्याचार और अधर्म के वातावरण में हुआ। कंस का आतंक, निरंतर संघर्ष और विपरीत परिस्थितियाँ उनके जीवन का हिस्सा रहीं, किंतु उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने आदर्शों पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड नहीं, बल्कि न्याय, सत्य, कर्तव्य और लोकहित के पक्ष में दृढ़तापूर्वक खड़ा होना है।महाभारत के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन मोह और विषाद से विचलित होकर अपने कर्तव्य से पीछे हटने लगे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म और धर्म का मर्म समझाया—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। कर्मफल की चिंता में बंधकर कर्तव्य से विमुख होना उचित नहीं है। यही निष्काम कर्मयोग का मूल संदेश है। श्रीकृष्ण ने कर्म से पलायन नहीं, बल्कि फल की आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करने की प्रेरणा दी।उनका यह संदेश आज के जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है। आज मनुष्य सफलता, प्रतिष्ठा और परिणाम की चिंता में अनेक बार अपने कर्तव्य और नैतिक मूल्यों से समझौता कर लेता है। श्रीकृष्ण का कर्मयोग हमें स्मरण कराता है कि हमारा प्रयास ईमानदार, उद्देश्य पवित्र और कर्म लोकहितकारी होना चाहिए। परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं है, लेकिन हमारा पुरुषार्थ और हमारी नीयत हमारे हाथ में है।
श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा को केवल व्यक्तिगत हित तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने स्पष्ट कहा—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब धर्म की पुनर्स्थापना आवश्यक हो जाती है। श्रीकृष्ण का जीवन इसी संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने अन्याय के सामने निष्क्रिय रहना स्वीकार नहीं किया। उनके लिए धर्म का अर्थ था—सत्य और न्याय की स्थापना तथा समाज के व्यापक कल्याण के लिए आवश्यक कर्म करना।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व हमें यह भी सिखाता है कि धर्म का मार्ग सदैव सरल नहीं होता। कभी-कभी धर्म की रक्षा के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति को अपने स्वार्थ, मोह और भय से ऊपर उठकर व्यापक हित को देखना चाहिए। यही कारण है कि श्रीकृष्ण का चरित्र केवल आध्यात्मिकता का नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन-बोध और कर्तव्यनिष्ठा का भी आदर्श है।
उन्होंने कर्म की महत्ता बताते हुए कहा—
“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन् कर्म परं आप्नोति पूरुषः॥”
अर्थात् आसक्ति रहित होकर निरंतर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार किया गया कर्म मनुष्य को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है।
आज जब समाज में स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा, असत्य और त्वरित सफलता की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब श्रीकृष्ण का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका जीवन हमें बताता है कि सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है सफलता का मार्ग; अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण है उसका सदुपयोग; और जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है कि हमारा जीवन समाज के लिए कितना उपयोगी रहा।
योगेश्वर श्रीकृष्ण का संदेश अंततः यही है कि मनुष्य सत्य और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहे, अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वहन करे, कर्म के फल के प्रति अनावश्यक आसक्ति न रखे और अपने पुरुषार्थ को लोककल्याण से जोड़े।श्रीकृष्ण का जीवन हमें परिस्थितियों से हारना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के बीच धर्म को पहचानकर कर्म करना सिखाता है। यही निष्काम कर्मयोग की सार्थकता है और यही उनके जीवन का वह शाश्वत संदेश है, जिसकी प्रासंगिकता किसी एक युग तक सीमित नहीं—वह हर युग, हर समाज और हर मनुष्य के लिए प्रेरणास्रोत है। आप सभी को श्री कृष्ण जन्मोतस्व की हार्दिक बधाई .



























































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