स्कूल में 30 दलित परिवार विस्थापितों की तरह जीने को मजबूर ----
मऊ। पिछले बरसात में आई भीषण बाढ़ की कटान की चपेट में आये लगभग ढाई दर्जन दलित परिवार आज भी एक प्राथमिक स्कूल के दो छोटे कमरों में रहने को विवश है। उसी में खाना बनाने से लेकर खाना, सोना,आदि सब कुछ समाहित है। इसी में उनके छोटे-छोटे बच्चे इस ठंड में उनको बचाना अति दुरूह कार्य है लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नही है। उल्लेखनीय है ग्रामसभा बिंदटोलिया में पिछले वर्ष बरसात से घाघरा नदी उफान पर थी। जिसने दलित बस्ती पर कहर ढा कर रख दिया। किसी को भी अपनी मकान का एक ईंट भी निकालने तक नहीं दिया। बड़े से बड़े पक्के मकान को भी मिनटों में अपने आगोश में ले लेना उसका कुछ सेकेंड का काम था। अभी कुछ लोग कटान को देखते हुए अपना सामान समेटने की तैयारी करते तब तक उसके मकान का आधा हिस्सा नदी में बह जाता था। किसी तरह लोग अपनी जान बचाकर भागते थे। यह सिलसिला एक दो बार नहीं बल्कि नदी में जब जब बाढ़ आई उन्हें घर छोड़कर बेघर होना पड़ा। कुछ दिनों तक तो उन्हें इधर-उधर भटकना पड़ा। बाद में उच्चाधिकारियों के आवागमन पर उन्हें नजदीक के प्राथमिक विद्यालय में रख दिया गया। जहां से उन्होंने अपनी दिनचर्या तो शुरू कर ली। लेकिन आज भी उन्हें अपने मकान की चाहत है जहां से वो अपनी जिंदगी चला सके। साजो सामान रख सके। पीड़ितों की माने तो उनकी सुनने वाला कोई नहीं है जिनसे वो अपनी फरियाद कह सकें। कई बार स्थानीय प्रशासन तक उन्होंने अपनी बात रखी लेकिन उनकी कोई सुनवाई आज तक नहीं हो सकी। जिसके कारण आज भी वह परिवार सहित मजबूरी में स्कूल में पड़े है। अब इसे आसानी से समझा जा सकता है कि स्कूल के एक कमरे में लगभग 12 से 14 परिवार एक साथ कैसे रहते होंगे, लेकिन मजबूरी का नाम..

























































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