दवाओं की एक्सपायरी पर केंद्र का नया नियम: मरीजों को कितना फायदा, मेडिकल कारोबारियों की कितनी बढ़ेगी मुश्किल?
संपादकीय लेख।दवा केवल एक कारोबार का उत्पाद नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी जरूरत है। किसी मरीज को दवा समय पर मिले, उसकी गुणवत्ता बनी रहे और वह एक्सपायरी के करीब पहुंची दवा खरीदने के लिए मजबूर न हो, यह स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने औषधि नियम, 1945 के नियम 31 में संशोधन करते हुए आयातित दवाओं की शेष उपयोग अवधि को लेकर नया प्रावधान लागू किया है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधिसूचना संख्या G.S.R. 951(E) के अनुसार, अब सामान्य दवाओं का भारत में आयात तभी किया जा सकेगा, जब आयात की तारीख पर उनकी एक्सपायरी में कम से कम एक वर्ष शेष हो। हालांकि, बायोलॉजिकल दवाओं और रेडियोफार्मास्यूटिकल्स के लिए लेबल पर अंकित कुल शेल्फ लाइफ का 60 प्रतिशत तक स्वीकार करने का प्रावधान रखा गया है।
यह नियम 28 अक्टूबर 2026 को राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ प्रभावी हो गया है। सरकार का दावा है कि इससे दवाओं की आपूर्ति व्यवस्था बेहतर होगी, अनावश्यक बर्बादी रुकेगी और मरीजों को पर्याप्त उपयोग अवधि वाली दवाएं मिल सकेंगी। लेकिन इस फैसले के साथ कई सवाल भी खड़े होते हैं। क्या वास्तव में आम जनता को इसका फायदा मिलेगा? क्या छोटे मेडिकल स्टोर, थोक दवा विक्रेता और मेडिकल एजेंसियों पर इसका कोई आर्थिक दबाव पड़ेगा?
•आम जनता को क्या होगा फायदा?
इस नियम का सबसे बड़ा उद्देश्य दवाओं की उपलब्धता और उनकी उपयोग अवधि के बीच संतुलन बनाना है।
1\. एक्सपायरी के नजदीक दवाओं के आयात पर रोक
अब सामान्य आयातित दवाओं को भारत में प्रवेश के समय कम से कम एक साल की शेष उपयोग अवधि रखनी होगी। इससे ऐसी दवाओं के आयात पर रोक लगेगी, जिनकी एक्सपायरी बहुत नजदीक है।
2\. मरीजों को दवा इस्तेमाल करने के लिए मिलेगा पर्याप्त समय
दवा विदेश से भारत आती है, फिर आयातक से थोक विक्रेता, थोक विक्रेता से मेडिकल स्टोर और वहां से मरीज तक पहुंचती है। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगता है। एक साल की शेष अवधि होने से वितरण और बिक्री के लिए अपेक्षाकृत पर्याप्त समय उपलब्ध रहेगा।
3\. दवाओं की बर्बादी कम होने की उम्मीद
कई बार कम शेष उपयोग अवधि के कारण आयातित दवाओं का स्टॉक समय पर बाजार तक नहीं पहुंच पाता। नए नियम से ऐसी दवाओं की अनावश्यक बर्बादी कम हो सकती है।
4\. दवाओं की उपलब्धता बेहतर हो सकती है
सरकार का मानना है कि नया नियम आयात और आपूर्ति व्यवस्था को सरल बनाएगा। इससे आवश्यक दवाओं की उपलब्धता मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
•दुकानदारों और मेडिकल एजेंसियों को क्या नुकसान हो सकता है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सरकार का नया नियम सीधे देश के प्रत्येक मेडिकल स्टोर या दवा दुकानदार पर एक साल की एक्सपायरी शेष रखने की बाध्यता नहीं लगाता। यह नियम मुख्य रूप से भारत में आयात के समय लागू होता है।
फिर भी इसका असर मेडिकल कारोबार की पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है।
1\. आयातित दवाओं के कारोबारियों पर दबाव
जो मेडिकल एजेंसियां विदेश से दवाएं मंगाती हैं, उन्हें अब अपनी खरीद और आयात योजना नए नियम के अनुसार बनानी होगी। कम शेष अवधि वाली दवाओं का आयात नहीं हो सकेगा। इससे कुछ विशेष उत्पादों की खरीद और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
2\. पुराने स्टॉक को लेकर अनिश्चितता
जिन कारोबारियों के पास पहले से आयातित दवाओं का स्टॉक है, उन्हें उसकी एक्सपायरी और बिक्री की समय-सीमा पर विशेष ध्यान देना होगा। हालांकि, नई अधिसूचना में पहले से आयातित स्टॉक के निस्तारण के लिए अलग से कोई संक्रमण व्यवस्था नहीं बताई गई है।
3\. छोटे कारोबारियों की पूंजी फंसने की आशंका
कुछ आयातकों को पर्याप्त शेष अवधि वाली दवाओं की खरीद के लिए नए सप्लायर तलाशने पड़ सकते हैं। इससे भुगतान की शर्तें, स्टॉक प्रबंधन और कार्यशील पूंजी पर दबाव पड़ने की आशंका है।
4\. कुछ विशेष दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है
यदि किसी खास आयातित दवा की आपूर्ति सीमित है और वह नए मानक के अनुरूप उपलब्ध नहीं हो पाती, तो संबंधित मेडिकल एजेंसियों और मरीजों को परेशानी हो सकती है। हालांकि, यह संभावित स्थिति है, इसका होना अभी प्रमाणित नहीं है।
5\. एक्सपायरी रिटर्न और छूट की व्यवस्था में बदलाव
कम शेष अवधि वाली दवाओं पर मिलने वाली विशेष छूट या जल्दी स्टॉक निकालने की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। दूसरी तरफ, अधिक उपयोग अवधि वाला स्टॉक मिलने से एक्सपायरी के कारण होने वाले नुकसान में कमी भी आ सकती है।
• क्या मेडिकल स्टोर पर रखी हर दवा की एक्सपायरी अब एक साल होनी चाहिए?
नया संशोधन आयात के समय दवा की शेष शेल्फ लाइफ से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में निर्मित प्रत्येक दवा या मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध प्रत्येक दवा की एक्सपायरी में अब एक साल शेष होना अनिवार्य हो गया है।
साथ ही, यह संशोधन दवाओं के गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता से जुड़े दूसरे नियामकीय मानकों को समाप्त नहीं करता।
सरकार ने जून 2026 में जारी मसौदे के साथ भी स्पष्ट किया था कि यह बदलाव आयात के समय शेष शेल्फ लाइफ की शर्त तक सीमित है।
•मरीजों की सुरक्षा जरूरी, लेकिन दवा कारोबार की व्यावहारिक परेशानियों को भी समझे सरकार
दवा की एक्सपायरी केवल एक तारीख नहीं होती, बल्कि यह मरीज की सुरक्षा और दवा कारोबार की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है। केंद्र सरकार का यह फैसला पहली नजर में मरीजों के हित में दिखाई देता है। आखिर कौन नहीं चाहेगा कि उसे ऐसी दवा मिले, जिसकी उपयोग अवधि पर्याप्त हो और जिसे खरीदने के कुछ ही दिनों बाद एक्सपायरी की चिंता न सताए?
लेकिन किसी भी सरकारी नियम की सफलता केवल उसे लागू कर देने से तय नहीं होती। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब वह आम जनता, छोटे दुकानदारों, थोक कारोबारियों और दवा आपूर्ति करने वाली एजेंसियों की रोजमर्रा की व्यवस्था से जुड़ता है।
सरकार का एक साल की शेष अवधि वाला मानक दवा आयातकों को अधिक जिम्मेदार बनाएगा। इससे कम उपयोग अवधि वाली दवाओं के आयात पर नियंत्रण होगा और दवाओं की अनावश्यक बर्बादी रोकने में मदद मिल सकती है। यह अच्छी पहल है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या देश के छोटे शहरों और कस्बों में जरूरत के मुताबिक सभी आयातित दवाएं समय पर उपलब्ध हो पाएंगी?
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा निजी मेडिकल स्टोर और दवा वितरण एजेंसियों के माध्यम से संचालित होता है। छोटे मेडिकल दुकानदार सीमित पूंजी में कारोबार करते हैं। कई बार किसी विशेष बीमारी की दवा कम मात्रा में बिकती है, जबकि उसकी मांग नियमित नहीं रहती। ऐसे में दवा की खरीद, भंडारण और एक्सपायरी का जोखिम पहले से ही उनके सामने रहता है।
हालांकि, नए नियम से हर दुकानदार को नुकसान होगा, ऐसा कहना भी उचित नहीं होगा। जिन आयातकों को पहले कम शेष अवधि वाली दवाओं के कारण स्टॉक नष्ट करना पड़ता था, उन्हें राहत मिल सकती है। पर्याप्त अवधि वाली दवाएं मिलने से मेडिकल एजेंसियों को स्टॉक बेचने के लिए अधिक समय मिलेगा। यानी यह बदलाव कुछ कारोबारियों के लिए नुकसान नहीं, बल्कि फायदे का कारण भी बन सकता है।
लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस नियम के कारण किसी आवश्यक दवा की आपूर्ति बाधित न हो। विशेष रूप से गंभीर बीमारियों, दुर्लभ रोगों और उन दवाओं के मामले में, जिनके विकल्प आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, आपूर्ति की निरंतरता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण सवाल दवाओं की कीमतों का है। यदि आयातकों की लागत बढ़ती है या आपूर्ति प्रभावित होती है, तो उसका बोझ किसी भी स्थिति में मरीजों पर नहीं पड़ना चाहिए। सरकार को इस बात की निगरानी करनी होगी कि नए नियम की आड़ में दवाओं के दाम बढ़ाने या बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिश न हो।
सरकार को मेडिकल एजेंसियों, थोक विक्रेताओं, खुदरा दवा कारोबारियों और मरीजों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद करना चाहिए। छोटे कारोबारियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए, ताकि नियम के पालन में किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे।
हमारा मानना है कि मरीजों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन दवा कारोबार को भी ऐसी व्यवस्था मिलनी चाहिए, जिसमें नियमों का पालन करना व्यावहारिक और आर्थिक रूप से संभव हो।
सरकार का उद्देश्य केवल एक्सपायरी वाली दवाओं को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए, जहां मरीज को सही दवा, उचित कीमत और जरूरत के समय उपलब्ध हो सके।
क्योंकि अंततः दवा कारोबार का सबसे बड़ा उद्देश्य मुनाफा नहीं, बल्कि मरीज का उपचार होना चाहिए। सरकार, दवा कंपनियों और मेडिकल कारोबारियों को इसी जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ना होगा। मेरे निजी विचार पर लेख -chandrashekhar























































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