निरंकारी सन्त की निकाली गई शव यात्रा , नम आंखों से शुभचिंतकों ने दी अंतिम विदाई
मुहम्मदपुर (आजमगढ़)।मुहम्मदपुर क्षेत्र के ग्राम कोहड़ौरा गाँव निवासी, पूर्व ग्राम प्रधान एवं संत निरंकारी मिशन की बिंद्रा बाजार ब्रांच के स्थानीय प्रभारी टी. आर. भगत (टूअर राम) का मंगलवार तड़के निधन हो गया। उनके निधन का समाचार मिलते ही आजमगढ़ क्षेत्र सहित संत निरंकारी मिशन से जुड़े श्रद्धालुओं और शुभचिंतकों में शोक की लहर दौड़ गई।
बुधवार सुबह लगभग 8 बजे उनके निवास स्थान से अंतिम यात्रा निकाली गई। अंतिम यात्रा सबसे पहले निरंकारी सत्संग भवन, रोहुआ पहुंची, जहां सैकड़ों संतों, श्रद्धालुओं एवं भगत प्रेमियों ने उनके अंतिम दर्शन कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इसके बाद शवयात्रा बिंद्रा बाजार होते हुए मुहम्मदपुर बाजार से मगई नदी के किनारे स्थित शिव घाट पहुंची। यात्रा के दौरान जगह-जगह लोगों ने पुष्पवर्षा कर उन्हें भावभीनी विदाई दी।
शिव घाट पर उनके छोटे सुपुत्र अरुण कुमार भगत ने अपने बड़े भाई कृष्ण कुमार भगत के साथ नम आंखों से पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान उपस्थित परिजनों, रिश्तेदारों, ग्रामीणों और मिशन से जुड़े श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
अंतिम यात्रा में सरोज अस्थाना, डॉ. पुष्पेन्द्र अस्थाना, जयराम, शाहबदीन यादव, डॉ. कन्हैया लाल श्रीवास्तव, श्यामनयन, कैलाश, हरिश्चंद्र, अमरनाथ विश्वकर्मा, रीता यादव, बीरेन्द्र यादव, धर्मेंद्र, सुभाष चंद्र अस्थाना, छोटेलाल, चंद्रशेखर, राजेश सरोज, भूपेंद्र अस्थाना, डॉ. विनोद, अजय कुमार, कमलेश, मिथिलेश, संतोष, विजय शील अस्थाना, डॉ. आलोक श्रीवास्तव एवं अधिवक्ता अवधेश कुमार, राम सिंगार सहित सैकड़ों लोगों ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
60 वर्षीय टी. आर. भगत जी वर्ष 1980 से संत निरंकारी मिशन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। उन्होंने बिंद्रा बाजार ब्रांच के पूर्व संयोजक एवं प्रवक्ता संत श्री प्रेम नारायण लाल जी तथा पूर्व संचालक राजधानी यादव जी के सान्निध्य में सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मिशन के प्रति उनकी निष्ठा, सेवाभाव और समर्पण के चलते उन्होंने लंबे समय तक विभिन्न आध्यात्मिक एवं सामाजिक सेवाओं में अपना योगदान दिया। वे स्थानीय स्तर पर सामाजिक कार्यों और धार्मिक आयोजनों में भी सक्रिय रहे।
उनके निधन को मुहम्मदपुर क्षेत्र, ग्राम कोहड़ौरा और संत निरंकारी मिशन परिवार के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसमूह और लोगों की आत्मीय सहभागिता उनके व्यक्तित्व, सेवाभाव तथा सामाजिक संबंधों का परिचायक रही।




















































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