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देवरिया में योगसूत्र पर हुआ चिंतन, निद्रा को बताया चित्त की एक महत्वपूर्ण वृत्ति

देवरिया। पतञ्जलि योगसूत्र के समाधि पाद के दसवें सूत्र "अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा" पर आयोजित चिंतन में विद्वानों ने निद्रा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि महर्षि पतञ्जलि ने निद्रा को केवल शारीरिक विश्राम या अज्ञान की अवस्था नहीं माना, बल्कि इसे चित्त की एक महत्वपूर्ण वृत्ति के रूप में परिभाषित किया है।

चर्चा में बताया गया कि जब मनुष्य निद्रा में होता है, तब बाह्य और आन्तरिक विषयों का ज्ञान नहीं रहता। उस समय चित्त "अभाव" अर्थात विषयों के अनुभव न होने के प्रत्यय को ही अपना आलम्बन बनाता है। यही कारण है कि जागने के बाद व्यक्ति कहता है, "मैं अच्छी तरह सोया" या "मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं हुआ।" यह अनुभव सिद्ध करता है कि निद्रा के समय भी चित्त अपनी एक विशिष्ट अवस्था में कार्य करता रहता है।

वक्ताओं ने शंकर परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि निद्रा में चित्त की कोई वृत्ति न होती, तो जागने के बाद निद्रा का स्मरण संभव नहीं होता। इसलिए योगदर्शन में निद्रा को चित्त का एक वास्तविक परिवर्तन माना गया है, जिसे योगाभ्यास के माध्यम से अंततः निरुद्ध करने का लक्ष्य रखा गया है।

चिंतन के अंत में कहा गया कि योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि चित्त की समस्त वृत्तियों को समझकर उन्हें नियंत्रित करते हुए समाधि की अवस्था तक पहुँचना है। इसी दृष्टि से निद्रा भी योगदर्शन में एक महत्वपूर्ण विषय मानी गई है।


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