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समय कह रहा, घर-घर में राणा प्रताप तैयार करो राणा प्रताप पीजी कॉलेज के स्थापना दिवस पर सजा राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, वीर रस और ओजस्वी काव्य से गुंजायमान हुआ क्षत्रिय भवन

सुलतानपुर।“गाली दे वीरों को संसद तो उसका भी उपचार करो,
शीश काट कर रिपुओं का भारत मां का श्रृंगार करो।
जो झुकने दिया न शीश राष्ट्र का, उसकी जय-जयकार करो,
समय कह रहा, घर-घर में राणा प्रताप तैयार करो।”
वीर रस के चर्चित कवि डॉ. रणजीत सिंह की इन ओजपूर्ण पंक्तियों ने जैसे ही क्षत्रिय भवन सभागार में गूंजना शुरू किया, पूरा वातावरण देशभक्ति और उत्साह से भर उठा। उपस्थित श्रोतागण तालियों की गड़गड़ाहट के साथ भावविभोर हो उठे। अवसर था राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के स्थापना दिवस पर आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का, जिसका आयोजन क्षत्रिय शिक्षा समिति द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. डी.एम. मिश्र ने की, जबकि संचालन अपने चिर-परिचित अंदाज में आशुकवि मथुरा प्रसाद सिंह ‘जटायु’ ने किया।
कवि सम्मेलन का शुभारंभ कवि ब्रजेश कुमार पाण्डेय ‘इन्दु’ की सरस्वती वंदना से हुआ—
“रग-रग में नई रवानी दे माई दे,
सबको तू चेतना सयानी माई दे।
देश की अखंडता न खंड-खंड हो सके,
सबको विवेक हिन्दुस्तानी माई दे।”
इसके बाद मंच पर आए आचार्य अभिमन्यु शुक्ल ‘तरंग’ ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी। उन्होंने कहा—
“नाम से ही जिसके चमकते हैं सूर्य सदा,
तुम्हें उस नाम की महत्ता का पता नहीं।”
प्रख्यात कवयित्री डॉ. निरुपमा श्रीवास्तव ने अपनी संवेदनशील रचनाओं से श्रोताओं को भावनाओं के संसार में पहुंचाया। उनकी पंक्तियां—
“बुनो प्यार के धागे कोमल, बिनो शहादत वाली चादर,
बुनो नेह की छलकी गागर, रघुनंदन की बगिया बीनो, मोहन का मेरे पीतांबर।”
व्यंग्य के रंग बिखेरते हुए निर्झर प्रतापगढ़ी ने समसामयिक व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया—
“असली जो गुनहगार थे स्वच्छंद हो गए,
जो बेगुनाह थे नजरबंद हो गए,
इस दौर में बेईमान हरिश्चंद्र हो गए।”
शायर डॉ. अब्दुल मन्नान एडवोकेट ने लोकतंत्र की विडंबनाओं को स्वर देते हुए कहा—
“हमारी बात को संसद में कैसे रखेगा,
हमारा सांसद गूंगा है और बहरा है।”
सीतापुर से आए साहित्यकार प्रमोद द्विवेदी ने वीरता का स्वर बुलंद करते हुए पढ़ा—
“जहां वीर सेना में भर्ती हेतु सदा आतुर रहते,
उस भारत को दास बनाये, बोलो इतना किसमें दम।”
लखनऊ से आए कवि अशोक पाण्डेय ‘अनहद’ ने माता-पिता के संस्कारों और महान व्यक्तित्व की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा—
“कई सदी तक तप अगर करते हैं मां-बाप,
तब जाकर सौभाग्य से मिलता एक प्रताप।”
अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. डी.एम. मिश्र ने सामाजिक संवेदनाओं को शब्द देते हुए कहा—
“मारा गया इंसाफ मांगने के जुर्म में,
इंसानियत के हक में बोलने के जुर्म में।
औरों की खुशी देख क्यों पाती नहीं दुनिया,
तोड़े गए हैं फूल महकने के जुर्म में।”
कार्यक्रम के संचालक मथुरा प्रसाद सिंह ‘जटायु’ ने अपनी ओजस्वी प्रस्तुति से समापन को यादगार बना दिया—
“कवि कुसुम की सेज पर सोता नहीं हूं मैं,
कलम को बम बनाने जा रहा हूं,
मैं नई दुनिया बसाने जा रहा हूं।”
कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत असिस्टेंट प्रोफेसर ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह ‘रवि’ ने किया, जबकि आभार ज्ञापन प्रोफेसर इन्द्रमणि कुमार ने व्यक्त किया।
इस अवसर पर महाविद्यालय प्रबंधक एडवोकेट बालचंद्र सिंह, पूर्व प्रबंधक एडवोकेट राम बहादुर सिंह, सुरेन्द्र नाथ सिंह, पूर्व प्राचार्य डॉ. एस.बी. सिंह, प्राचार्य प्रो. डी.के. त्रिपाठी, एडवोकेट रणजीत सिंह, जीतेन्द्र श्रीवास्तव तथा सूर्य प्रताप सिंह ने सभी कवियों को अंगवस्त्र और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया।
महाविद्यालय स्थापना दिवस के अवसर पर प्रकाशित वार्षिक पत्रिका ‘प्रताप प्रतिमा’ भी कवियों को भेंट की गई।
कार्यक्रम में बाबा सत्यनाथ मठ, अल्देमऊ नूरपुर के पीठाधीश्वर कपाली बाबा, क्षत्रिय शिक्षा समिति के अध्यक्ष एडवोकेट संजय सिंह, डॉ. संतोष सिंह ‘अंश’ सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक, शिक्षक, छात्र-छात्राएं एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।
राष्ट्रीय कवि सम्मेलन ने न केवल साहित्यिक ऊर्जा का संचार किया, बल्कि वीरता, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गौरव के संदेश को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक कार्य किया।


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