जन्म और अल्पायु का वरदान
•ऋषि मार्कण्डेय हिंदू धर्म के सबसे प्रसिद्ध और चिरायु (अमर) ऋषियों में से एक हैं। उनकी कहानी अटूट भक्ति, दृढ़ संकल्प और अकाल मृत्यु पर विजय की एक महान गाथा है।
वाराणसी ।मार्कण्डेय जी महान ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्वती के पुत्र थे। कई वर्षों तक सन्तानहीन रहने के बाद, ऋषि मृकण्डु ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दो विकल्प दिए:
या तो उन्हें एक ऐसा मंदबुद्धि पुत्र मिले जो 100 वर्षों तक जीवित रहे।
या फिर एक अत्यंत बुद्धिमान, ज्ञानी और धार्मिक पुत्र मिले, जिसकी आयु केवल 16 वर्ष हो।
ऋषि मृकण्डु ने अल्पायु लेकिन ज्ञानी पुत्र का विकल्प चुना। इस प्रकार बालक मार्कण्डेय का जन्म हुआ।
शिव जी की अनन्य भक्ति
मार्कण्डेय बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी और भगवान शिव के परम भक्त थे। जब वे 16 वर्ष के होने वाले थे, तब उनके माता-पिता उदास रहने लगे। जब मार्कण्डेय को अपनी अल्पायु का कारण पता चला, तो वे तनिक भी भयभीत नहीं हुए। उन्होंने समुद्र तट पर जाकर मिट्टी से एक शिवलिंग बनाया और भगवान शिव की घोर तपस्या में लीन हो गए।
यमराज से रक्षा और अमरता
जब मार्कण्डेय की आयु के 16 वर्ष पूरे हुए, तो काल (मृत्यु के देवता यमराज) उनके प्राण लेने स्वयं आए।
यमराज को देखकर बालक मार्कण्डेय डरने के बजाय शिवलिंग से लिपट गए और शिव जी की स्तुति करने लगे।
यमराज ने जब अपने पाश (रस्सी) को मार्कण्डेय पर फेंका, तो वह पाश शिवलिंग पर भी जा गिरा।
अपने भक्त संकट में देखकर और शिवलिंग पर पाश गिरते ही भगवान शिव अत्यंत क्रोधित होकर शिवलिंग से प्रकट हुए।
शिव जी ने यमराज को अपने त्रिशूल से पीछे धकेल दिया और अपने भक्त की रक्षा की।
भगवान शिव ने यमराज से कहा कि मार्कण्डेय की भक्ति के कारण अब काल का प्रभाव उस पर नहीं पड़ेगा। शिव जी ने मार्कण्डेय को 'सदा 16 वर्ष' के बने रहने और अमरता का वरदान दिया। इसी कारण भगवान शिव को 'कालान्तक' (काल का अंत करने वाले) भी कहा जाता है।
मार्कण्डेय जी का योगदान
महामृत्युंजय मंत्र: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमराज से अपने प्राणों की रक्षा के लिए ऋषि मार्कण्डेय ने ही शक्तिशाली महामृत्युंजय मंत्र की रचना की थी।
मार्कण्डेय पुराण: अष्टादश पुराणों में से एक 'मार्कण्डेय पुराण' इन्हीं के नाम पर है। प्रसिद्ध 'दुर्गा सप्तशती' (श्री चंडी पाठ) इसी पुराण का भाग है।
ऋषि मार्कण्डेय की कथा यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति, विश्वास और ईश्वर पर समर्पण के सामने मृत्यु और काल का भय भी समाप्त हो जाता है।






















































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