21 सितंबर 2025, रविवार सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध 11:51 AM से 12:38 PM 12:38 PM से 01:27 PM 01:27 PM से 03:53 PM कब करना चाहिए श्राद्ध
21 सितंबर 2025, रविवार सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध 11:51 AM से 12:38 PM 12:38 PM से 01:27 PM 01:27 PM से 03:53 PM
कब करना चाहिए श्राद्ध
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध या तर्पण दोपहर 12 बजे के बाद करने से अनुरूप फल प्राप्त होते हैं। इसके अलावा दिन में कुतुप और रोहिणी मुहूर्त श्राद्ध कर्म के लिए सबसे शुभ माने जाते हैं। श्राद्ध करने के लिए किसी योग्य ब्राह्मण को घर पर बुलाकर मंत्रों का उच्चारण करें और पूजा के बाद जल से तर्पण करें। इसके बाद गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन निकालें। इन जीवों को भोजन देते समय अपने पितरों का स्मरण जरूर करें।
पितृ पक्ष में तर्पण कैसे करें
* पितरों को पानी पिलाने की प्रक्रिया को ही तर्पण कहा जाता है।
* तर्पण करने के लिए एक पीतल या फिर स्टील की परात लें।
* उसमें शुद्ध जल डालें और फिर थोड़े काले तिल और दूध डालें।
* इस परात को अपने सामने रखें और एक अन्य खाली पात्र भी पास में रखें।
* फिर अपने दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी ऊंगली के मध्य में दूर्वा यानी कुशा लेकर अंजलि बना लें। यानी दोनों हाथों को मिलाकर उसमें जल भर लें।
* इसके बाद अंजलि में भरा हुआ जल दूसरे खाली पात्र में डालें।
* जल डालते समय अपने प्रत्येक पितृ के लिए कम से कम तीन बार अंजलि से तर्पण करें।
पितृ पक्ष में घर पर कैसे करें श्राद्ध
* श्राद्ध वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। इसके बाद घर की साफ-सफाई करें और पूरे घर में गंगाजल छिड़कें।
* इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बाएं पैर को मोड़कर बाएं घुटने को जमीन पर टिका कर बैठ जाएं।
* फिर एक तांबे का चौड़ा बर्तन लें जिसमें काले तिल, गाय का कच्चा दूध और गंगाजल पानी डालें।
* फिर जल को दोनों हाथों में भरकर सीधे हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में गिराएं और इस दौरान अपने पितकों का स्मरण करें।
* पितरों के लिए भोजन तैयार करें।
* श्राद्ध के लिए ब्राह्मण को घर पर बुलाएं और सच्चे मन से उन्हें भोजन कराएं और ब्राह्मण के पैर धोएं।
* श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त अग्नि में गाय के दूध से बनी खीर अवश्य अर्पित करें।
* इस बात का विशेष ध्यान रखें कि ब्राह्मण को *भोजन कराने से पहले पंचबली यानी गाय, कुत्ते, कौवे, देवता और चींटी के लिए भोजन अवश्य निकालें। ये एक महत्वपूर्ण परंपरा है।
*भोजन के बाद ब्राह्मणों को दान भी करें और उनका आशीर्वाद लें।






















































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