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कुर्सी छोड़ना आसान है, संवेदनशीलता की विरासत छोड़ना नहीं

बरहज:उत्तर प्रदेश की चर्चित आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का अपने लगभग 13 वर्षों की प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र देने का निर्णय भी ऐसा ही एक प्रसंग है, जिसने उनके लाखों प्रशंसकों को चौंकाया है और उन्हें सोचने पर विवश किया है कि आखिर ऐसा क्या रहा होगा, जिसने एक संवेदनशील और सफल अधिकारी को देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में से एक को छोड़ने का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया।
दिव्या मित्तल की कहानी केवल एक आईएएस अधिकारी की कहानी नहीं है। यह उस युवा प्रतिभा की कहानी है, जिसने आईआईटी और आईआईएम बेंगलुरु जैसी देश की शीर्ष संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त की, जेपी मॉर्गन जैसी प्रतिष्ठित संस्था में शानदार करियर बनाया और सुख-सुविधाओं से भरे कॉरपोरेट जीवन को छोड़कर फिर देश की मिट्टी और अपने लोगों के बीच लौटने का निर्णय लिया।उनके भीतर शायद पद से अधिक मातृभूमि के प्रति लगाव और समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी थी। इसी भाव ने उन्हें सिविल सेवा की ओर खींचा। तीन प्रयासों में आईआरएस, आईपीएस और अंततः आईएएस जैसी सेवाओं में सफलता हासिल करना उनकी असाधारण प्रतिभा, दृढ़ता और संकल्प का प्रमाण है।लेकिन उनकी पहचान केवल उनकी परीक्षा की सफलता या पद से नहीं बनी। उनकी असली पहचान बनी लोगों के बीच रहकर, उनकी समस्याओं को समझकर और संवेदनशीलता के साथ समाधान तलाशने से।
संत कबीर नगर, मिर्जापुर और देवरिया जैसे जिलों में जिलाधिकारी के रूप में उनके कार्यकाल को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। प्रशासनिक व्यवस्था में नियम-कायदे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन किसी अधिकारी को लोगों के दिल में जगह उसकी संवेदनशीलता ही दिलाती है। दिव्या मित्तल ने अपने कार्यकाल में इसी मानवीय पक्ष को बार-बार सामने रखा।मिर्जापुर के एक गांव में आजादी के 75 वर्ष बाद जब जलापूर्ति की व्यवस्था पहुंची, तब एक 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला ने जिस भावुकता के साथ उनके सिर को अपने कांपते हाथों से थाम लिया, वह दृश्य किसी सरकारी उपलब्धि से कहीं अधिक बड़ा था।
वह केवल पानी की एक योजना का पूरा होना नहीं था।वह उस बुजुर्ग महिला की आंखों में दशकों से पल रहे इंतजार का समाप्त होना था।
वह उस भरोसे की जीत थी, जो एक आम नागरिक सरकार और उसके प्रतिनिधि से करता है।और शायद यही वह क्षण होता है जब एक अधिकारी को अहसास होता है कि फाइलों पर किए गए हस्ताक्षरों का असली अर्थ क्या है।एक अधिकारी के लिए किसी परियोजना का उद्घाटन कुछ मिनटों का कार्यक्रम हो सकता है, लेकिन किसी गरीब परिवार के लिए वह पूरी जिंदगी बदल देने वाला क्षण हो सकता है। दिव्या मित्तल के प्रशासनिक व्यक्तित्व की खूबसूरती शायद इसी अंतर को समझने में थी।
प्रधानमंत्री के समक्ष देश के चुनिंदा आईएएस अधिकारियों द्वारा की जाने वाली प्रस्तुतियों में उनका तीन बार शामिल होना भी उनकी कार्यकुशलता और प्रशासनिक प्रयोगों की स्वीकार्यता को दर्शाता है। लेकिन किसी अधिकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि किसी साधारण नागरिक के चेहरे पर यह विश्वास पैदा करना है कि “सरकार तक मेरी आवाज पहुंच सकती है।”और दिव्या मित्तल की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण शायद यही विश्वास है।इसीलिए उनके त्यागपत्र की खबर ने लोगों को केवल इसलिए नहीं चौंकाया कि एक आईएएस अधिकारी ने नौकरी छोड़ दी। लोगों को इसलिए झटका लगा क्योंकि उन्होंने उस पद में एक ऐसी अधिकारी की छवि देखी थी, जो सत्ता के गलियारों से अधिक आम आदमी के बीच दिखाई देती थी।
आखिर उन्होंने त्यागपत्र क्यों दिया?
इसका वास्तविक उत्तर वही जानती हैं। किसी व्यक्ति के निजी निर्णय के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं—व्यक्तिगत आकांक्षाएं, परिवार, जीवन की प्राथमिकताएं, भीतर की कोई बेचैनी या फिर किसी नए उद्देश्य की तलाश। बाहर बैठकर उस निर्णय की वजह तय कर देना उचित नहीं होगा।लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि पद छोड़ना किसी उपलब्धि का अंत नहीं होता। कभी-कभी यह जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत भी होता है।
दिव्या मित्तल ने जिस तरह अपनी पहली पारी में प्रशासनिक सेवा को मानवीय स्पर्श दिया, उससे उम्मीद की जा सकती है कि उनकी दूसरी पारी भी किसी बड़े उद्देश्य और व्यापक जनहित से जुड़ी होगीकिसी अधिकारी की पहचान उसकी कुर्सी से होती है, लेकिन उसकी विरासत उसके फैसलों और लोगों के दिलों में छोड़ी गई छाप से बनती है।
कुर्सी आज है, कल किसी और के पास होगी।पद आज है, कल कोई दूसरा संभालेगा।लेकिन जिस बुजुर्ग महिला के घर पानी पहुंचने पर उसकी आंखों में खुशी के आंसू आए, जिस आम आदमी को प्रशासन में अपना प्रतिनिधि दिखाई दिया और जिन लाखों लोगों ने एक अधिकारी में संवेदनशीलता देखी—उनकी स्मृतियों से किसी अधिकारी का नाम आसानी से मिटता नहीं।
दिव्या मित्तल के त्यागपत्र को इसलिए केवल एक आईएएस अधिकारी का सेवा से अलग होना मानना शायद उनके व्यक्तित्व को बहुत छोटा कर देना होगा।यह एक ऐसी अधिकारी की पहली पारी का विराम है, जिसने यह साबित किया कि प्रशासन में अधिकार के साथ संवेदना हो तो सरकारी पद केवल शासन करने का माध्यम नहीं रहता, वह समाज की पीड़ा को समझने और उसे कम करने का साधन बन जाता है।हो सकता है आने वाले समय में दिव्या मित्तल किसी बिल्कुल नए क्षेत्र में दिखाई दें। हो सकता है उनकी दूसरी पारी का स्वरूप आज की हमारी कल्पना से बिल्कुल अलग हो।लेकिन एक बात शायद लंबे समय तक बनी रहेगी ।


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