संपादकीय: राखी से ठीक पहले चीख उठी सड़क... किसी बहन की कलाई सूनी, किसी मां की गोद उजड़ी
•रक्षाबंधन की पूर्व रात पवई में हुआ भीषण हादसा सिर्फ दुर्घटना नहीं, हमारी सड़क व्यवस्था, यातायात अनुशासन और सामूहिक लापरवाही के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है
संपादकीय | GGS NEWS 24
रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था।
बहनें अपने भाइयों की कलाई पर प्रेम और विश्वास का धागा बांधने की तैयारी कर रही थीं। कहीं राखियां खरीदी जा रही थीं, कहीं मिठाइयां तैयार हो रही थीं और कहीं बहनें अपने मायके पहुंचने के लिए रास्ते में थीं।
लेकिन इसी त्योहार की पूर्व रात आजमगढ़ के पवई क्षेत्र में सड़क ने ऐसा कहर बरपाया कि कई घरों की खुशियां मातम में बदल गईं।
पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर चकिया अंडरपास के पास, माइलस्टोन 191 के आसपास, गुरुवार भोर करीब 2:15 बजे लखनऊ से बलिया जा रही रोडवेज बस और पिकअप की भीषण भिड़ंत हो गई। हादसे में दो लोगों की मौत और 32 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई।
जिस रात बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधने वाली थीं, उसी रात किसी परिवार ने अपना भाई खो दिया, किसी ने बेटा, किसी ने पति और किसी मां की गोद सूनी हो गई।
रक्षाबंधन की खुशियों और सड़क हादसे के इस दर्दनाक विरोधाभास ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है—आखिर हमारी सड़कें सुरक्षित कब होंगी?
यह केवल दो वाहनों की टक्कर नहीं थी
हर सड़क हादसे के बाद हम कहते हैं—“बहुत दर्दनाक हादसा था।”
कुछ दिन तक चर्चा होती है।
मृतकों के परिजनों को मुआवजा मिलता है।
घायलों का इलाज कराया जाता है।
अधिकारी घटनास्थल का निरीक्षण करते हैं।
जांच के आदेश होते हैं।
फिर कुछ दिन बाद सब शांत हो जाता है।
लेकिन मृतक के घर में शांति कभी नहीं लौटती।
जिस मां ने अपने बेटे को खोया है, वह हर रक्षाबंधन पर उसकी कलाई याद करेगी।
जिस बहन का भाई चला गया, वह राखी लेकर बैठी रह जाएगी।
जिस बच्चे ने पिता को खो दिया, उसके लिए त्योहार की मिठाई भी शायद हमेशा कड़वी रहेगी।
मुआवजा आर्थिक मदद हो सकता है, लेकिन किसी इंसान की जिंदगी की कीमत नहीं हो सकता।
भारत में सड़कें विकास की रफ्तार हैं, लेकिन मौत की रफ्तार भी बढ़ रही है
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार 2023 में देश में करीब 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं और 1.72 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
लेकिन तस्वीर यहीं नहीं रुकी।
2025 में देश में सड़क दुर्घटनाओं से 1.8 लाख से अधिक मौतें होने की सरकारी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट सामने आई है—यानी औसतन लगभग 502 मौतें प्रतिदिन। यह सरकारी रिकॉर्ड में अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में है।
और उत्तर प्रदेश की स्थिति विशेष चिंता पैदा करती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य में सड़क दुर्घटना मौतें 2024 के 24,118 से बढ़कर 2025 में 27,550 हो गईं।
यानी जिस प्रदेश में करोड़ों लोग सड़कों से यात्रा करते हैं, वहां सड़क सुरक्षा को लेकर और ज्यादा गंभीरता की जरूरत है।
2026 भी चेतावनी दे रहा है
2026 के पूरे वर्ष का आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा अभी सामने नहीं आया है, इसलिए पूरे साल की तस्वीर बताना जल्दबाजी होगी।
लेकिन उपलब्ध पुलिस आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से अप्रैल 2026 के दौरान सड़क हादसों में मौतें पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 9.4 प्रतिशत बढ़ीं।
इसका मतलब साफ है—
खतरा अभी टला नहीं है।
सड़क सुरक्षा को लेकर हमें आंकड़ों के पूरे वर्ष के आने का इंतजार नहीं करना चाहिए। हर हादसा अपने आप में एक चेतावनी है।
सबसे बड़ा हत्यारा कौन?
सरकारी सड़क दुर्घटना आंकड़ों में तेज रफ्तार लगातार सबसे प्रमुख कारणों में रही है। 2023 के आधिकारिक आंकड़ों में ओवरस्पीडिंग से बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं और मौतें दर्ज हुईं।
लेकिन सवाल यह है कि तेज रफ्तार कौन कर रहा है?
चालक?
वाहन मालिक?
परिवहन व्यवस्था?
या पूरा समाज?
जब हम समय पर पहुंचने के लिए चालक पर दबाव डालते हैं, जब रातभर बस चलती है, जब चालक की थकान की अनदेखी होती है, जब सड़क खाली देखकर वाहन की गति सीमा भूल जाते हैं—तब दुर्घटना की नींव उसी समय रख दी जाती है।
रात और भोर का सफर सबसे अधिक संवेदनशील
पवई का हादसा रात करीब 2:15 बजे हुआ।
यह वह समय है जब शरीर स्वाभाविक रूप से नींद मांगता है। लंबी दूरी के चालक यदि लगातार वाहन चला रहे हों तो थकान और झपकी का खतरा बढ़ जाता है।
इसलिए लंबी दूरी की बसों और भारी वाहनों के लिए केवल ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन की फिटनेस पर्याप्त नहीं होनी चाहिए।
जरूरी है—
चालक की पर्याप्त नींद, नियमित विश्राम, ड्राइविंग घंटे की निगरानी और वास्तविक फिटनेस जांच।
कागज पर फिट चालक और सड़क पर थका हुआ चालक—इन दोनों के बीच का अंतर किसी परिवार के जीवन और मौत का अंतर बन सकता है।
एक्सप्रेस-वे पर रफ्तार के साथ सुरक्षा भी चाहिए
पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे जैसी आधुनिक सड़कें विकास का प्रतीक हैं। लेकिन एक्सप्रेस-वे केवल अच्छी सड़क और तेज गति का नाम नहीं है।
इसके साथ चाहिए—
- प्रभावी स्पीड मॉनिटरिंग
- सीसीटीवी निगरानी
- नियमित पेट्रोलिंग
- पर्याप्त रिफ्लेक्टर और रोड मार्किंग
- अंडरपास व इंटरचेंज पर पर्याप्त प्रकाश
- आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था
- त्वरित एंबुलेंस सेवा
- गलत दिशा में चलने वाले वाहनों पर कठोर कार्रवाई
- थके हुए चालकों की पहचान और रोकथाम
सड़क जितनी तेज होगी, गलती की कीमत उतनी ही बड़ी होगी।
पिकअप को लेकर उठे सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी
इस हादसे के बाद ग्रामीणों की ओर से पिकअप को लेकर कुछ आशंकाएं जताई गई हैं। ऐसी आशंकाओं को पुलिस जांच और आधिकारिक पुष्टि के बिना तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
लेकिन दुर्घटना की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
पिकअप किस गति से चल रही थी?
उसकी स्थिति क्या थी?
क्या वाहन नियमों के अनुसार चल रहा था?
क्या चालक की गलती थी?
क्या बस की गति निर्धारित सीमा में थी?
क्या किसी वाहन ने गलत दिशा से आकर खतरा पैदा किया?
इन सवालों के वैज्ञानिक जवाब सामने आने चाहिए।
किसी निर्दोष को दोषी बनाना भी अन्याय है और दोषी को बचाना भी।
हादसे के बाद मुआवजा जरूरी है, लेकिन हादसे से पहले व्यवस्था क्यों नहीं?
सरकार मृतकों के परिवार को आर्थिक सहायता दे सकती है।
घायलों का इलाज करा सकती है।
लेकिन क्या हम उस मां के आंसू खरीद सकते हैं जिसने अपना बेटा खो दिया?
क्या हम उस बहन की राखी वापस ला सकते हैं जिसका भाई अब कभी कलाई आगे नहीं करेगा?
क्या हम उस बच्चे के सिर पर पिता का हाथ फिर से रख सकते हैं?
नहीं।
इसलिए सरकार की असली सफलता मुआवजा बांटने में नहीं, बल्कि हादसे कम करने में मानी जानी चाहिए।
हर हादसे की जांच केवल एफआईआर तक सीमित न हो
बड़े सड़क हादसे के बाद केवल यह पता करना पर्याप्त नहीं कि किस चालक ने कौन-सी गलती की।
एक स्वतंत्र रोड सेफ्टी ऑडिट होना चाहिए।
हादसे की जगह का डिजाइन कैसा था?
दृश्यता कितनी थी?
रोशनी पर्याप्त थी या नहीं?
सड़क संकेत स्पष्ट थे या नहीं?
वाहनों की गति क्या थी?
चालक कितने समय से वाहन चला रहा था?
वाहन की फिटनेस कैसी थी?
आपातकालीन सहायता कितनी देर में पहुंची?
इन सभी सवालों के जवाब रिकॉर्ड होने चाहिए।
क्योंकि जांच का उद्देश्य केवल दोषी ढूंढना नहीं, अगला हादसा रोकना होना चाहिए।
रक्षाबंधन हमें क्या सिखाता है?
रक्षाबंधन केवल राखी बांधने का त्योहार नहीं है।
यह भाई-बहन के बीच सुरक्षा, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
लेकिन आज सड़क पर हर व्यक्ति किसी न किसी का भाई है।
हर महिला किसी की बहन है।
हर बच्चा किसी मां-बाप की दुनिया है।
इसलिए सड़क पर सुरक्षित वाहन चलाना भी किसी की रक्षा करने जैसा ही है।
जब कोई चालक तेज गति से वाहन चलाता है, गलत दिशा में जाता है या नशे में गाड़ी चलाता है, तो वह सिर्फ यातायात नियम नहीं तोड़ता—वह किसी परिवार की जिंदगी को खतरे में डालता है।
सवाल अब हम सबके सामने है
पवई की रात बीत जाएगी।
घायल धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाएंगे।
सड़क पर यातायात फिर सामान्य हो जाएगा।
लेकिन जिन दो परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, उनके लिए वह रात कभी खत्म नहीं होगी।
और शायद अगली राखी पर किसी घर में फिर एक खाली कुर्सी होगी।
किसी बहन के हाथ में राखी होगी, लेकिन बांधने के लिए भाई नहीं होगा।
इसलिए अब सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं चाहिए।
सिर्फ मुआवजा नहीं चाहिए।
सिर्फ जांच के आदेश नहीं चाहिए।
चाहिए—जवाबदेही।
चाहिए—कठोर यातायात अनुशासन।
चाहिए—वैज्ञानिक सड़क सुरक्षा व्यवस्था।
चाहिए—थके और लापरवाह चालकों पर निगरानी।
चाहिए—हर ब्लैक स्पॉट और दुर्घटना संभावित स्थान का स्थायी समाधान।
और सबसे बढ़कर चाहिए—इंसान की जिंदगी को समय से ज्यादा महत्व देने की मानसिकता।
क्योंकि बस कुछ मिनट जल्दी पहुंचने के लिए यदि कोई चालक इतनी तेज गाड़ी चलाता है कि किसी घर का चिराग बुझ जाए, तो वह मंजिल तक पहुंचना नहीं, इंसानियत से हार जाना है।
इस रक्षाबंधन पर एक संकल्प जरूरी है—
राखी की डोर तभी मजबूत होगी, जब सड़क पर जिंदगी सुरक्षित होगी।
गति से ज्यादा जरूरी जिंदगी है।
मंजिल से ज्यादा जरूरी सुरक्षित वापसी है।
और सड़क पर हर इंसान किसी न किसी का अपना है।
पवई की यह रात सिर्फ एक हादसे की खबर बनकर न रह जाए—यह पूरे प्रदेश के लिए सड़क सुरक्षा बदलने की शुरुआत बने।






















































Leave a comment