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उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ: जब शहनाई ने भारत की आत्मा को आवाज़ दी

विशेष संपादकीय | GGS NEWS 24।भारत की महानता केवल उसकी प्राचीन सभ्यता, विशाल इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं में नहीं है। भारत की असली शक्ति उन महान व्यक्तित्वों में भी दिखाई देती है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और साधना से देश की संस्कृति को दुनिया के सामने नई पहचान दी। उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ उन्हीं महान विभूतियों में से एक थे।

उनकी शहनाई की आवाज़ केवल संगीत नहीं थी। वह बनारस की गलियों की आवाज़ थी, गंगा की लहरों की आवाज़ थी, मंदिरों की घंटियों और अजान के बीच पनपी उस संस्कृति की आवाज़ थी, जिसमें अलग-अलग आस्थाएं एक साथ सांस लेती हैं।

उन्होंने जिस शहनाई को कभी मुख्यतः विवाह और मांगलिक अवसरों का वाद्य माना जाता था, उसे भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित मंच तक पहुंचाया। संगीत नाटक अकादमी के आधिकारिक अभिलेख भी उन्हें उस कलाकार के रूप में दर्ज करते हैं जिसने शहनाई को शास्त्रीय संगीत में उसकी विशिष्ट ऊंचाई दिलाई।

डुमरांव से काशी तक का सफर

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम कमरुद्दीन ख़ाँ बताया जाता है। संगीत उनके परिवार की परंपरा में था, लेकिन जिस ऊंचाई तक उन्होंने इस कला को पहुंचाया, वह उनकी अपनी कठोर साधना का परिणाम थी।

उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बनारस से जुड़ा। उन्होंने अपने मामा उस्ताद अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई की शिक्षा ली। अली बख्श काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े शहनाई वादक थे। संगीत नाटक अकादमी के दस्तावेज में भी अली बख्श के मार्गदर्शन और काशी विश्वनाथ मंदिर से उनके संबंध का उल्लेख मिलता है।

यहीं से बिस्मिल्ला ख़ाँ की साधना ने वह रूप लिया, जिसने आगे चलकर भारतीय संगीत का इतिहास बदल दिया।

गंगा के किनारे जन्म लेते थे नए सुर

बिस्मिल्ला ख़ाँ के लिए बनारस केवल रहने की जगह नहीं था। काशी उनके लिए संगीत की प्रयोगशाला थी।

गंगा के घाट, मंदिरों का वातावरण और काशी की आध्यात्मिकता उनके संगीत में उतरती चली गई। वे लंबे समय तक रियाज़ करते थे। उनका मानना था कि संगीत को केवल सीखा नहीं जा सकता, उसे साधना पड़ती है।

उनकी शहनाई में जो गहराई सुनाई देती थी, वह वर्षों के रियाज़ की देन थी।

यही कारण है कि उनका संगीत सुनते समय ऐसा लगता था जैसे शहनाई बोल रही हो, रो रही हो, मुस्कुरा रही हो और कभी-कभी प्रार्थना कर रही हो।

शहनाई को मिला शास्त्रीय संगीत का सम्मान

बिस्मिल्ला ख़ाँ से पहले शहनाई की अपनी लोकप्रियता थी, लेकिन उसे शास्त्रीय संगीत के गंभीर मंच पर वह स्थान नहीं मिला था जो अन्य वाद्यों को प्राप्त था।

बिस्मिल्ला ख़ाँ ने इस स्थिति को बदल दिया।

उन्होंने शहनाई में रागों की ऐसी प्रस्तुति विकसित की कि बड़े-बड़े संगीतज्ञ और श्रोता उनकी कला के मुरीद हो गए। उन्होंने साबित किया कि किसी वाद्य की प्रतिष्ठा उसके आकार या परंपरागत उपयोग से तय नहीं होती, बल्कि कलाकार की साधना उसे नई ऊंचाई दे सकती है।

यही उनकी सबसे बड़ी संगीत-साधना थी।

14 वर्ष की उम्र में पहला बड़ा सार्वजनिक मंच

संगीत नाटक अकादमी के अभिलेख के अनुसार, बिस्मिल्ला ख़ाँ ने 14 वर्ष की आयु में इलाहाबाद के ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में अपना पहला बड़ा सार्वजनिक संगीत प्रदर्शन किया।

इतनी कम उम्र में मिली यह पहचान आगे चलकर एक असाधारण संगीत यात्रा का प्रारंभ बनी।

उन्होंने धीरे-धीरे अपनी शैली विकसित की और शहनाई को ऐसी अभिव्यक्ति दी जो पहले शायद ही किसी ने कल्पना की थी।

15 अगस्त 1947: आजादी की सुबह और शहनाई

भारत की आजादी का दिन बिस्मिल्ला ख़ाँ के जीवन का ही नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का भी एक यादगार अध्याय है।

15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब लाल किले से स्वतंत्र भारत का नया अध्याय शुरू हो रहा था। इसी ऐतिहासिक अवसर पर बिस्मिल्ला ख़ाँ की शहनाई की गूंज ने आजादी के उत्सव को एक अद्भुत सांस्कृतिक स्वर दिया।

उनकी शहनाई धीरे-धीरे स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय स्मृतियों का हिस्सा बन गई।

यह दृश्य कल्पना कीजिए—एक ओर तिरंगा, दूसरी ओर आजादी की खुशी और बीच में शहनाई के सुर।

वह केवल संगीत कार्यक्रम नहीं था। वह गुलामी से स्वतंत्रता की यात्रा का सांस्कृतिक प्रतीक था।

धर्म से ऊपर इंसानियत

बिस्मिल्ला ख़ाँ की सबसे बड़ी विरासत केवल संगीत नहीं, बल्कि उनका जीवन-दर्शन भी है।

वे मुस्लिम थे, लेकिन काशी के मंदिरों और हिंदू धार्मिक वातावरण से उनका गहरा संबंध था। उनके संगीत ने धार्मिक सीमाओं को कभी स्वीकार नहीं किया।

उनके लिए सुर ही सबसे बड़ी साधना थे।

यही कारण है कि उनका नाम भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब के सबसे सुंदर प्रतीकों में लिया जाता है।

आज जब समाज में छोटी-छोटी बातों पर विभाजन की आवाजें सुनाई देती हैं, तब बिस्मिल्ला ख़ाँ का जीवन हमें याद दिलाता है कि भारत की आत्मा हमेशा से विविधता में एकता रही है।

उनकी शहनाई किसी एक धर्म के लिए नहीं बजती थी—वह पूरे भारत के लिए बजती थी।

दुनिया के मंच पर भारत की शहनाई

बिस्मिल्ला ख़ाँ ने भारत के बाहर भी अनेक महत्वपूर्ण मंचों पर प्रस्तुति दी। संगीत नाटक अकादमी के आधिकारिक दस्तावेज में उनके फ्रांस और तत्कालीन सोवियत संघ सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समारोहों में प्रदर्शन का उल्लेख है।

उन्होंने दुनिया को बताया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल सितार, तबला या गायन तक सीमित नहीं है। शहनाई भी विश्वस्तरीय संगीत अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकती है।

उनकी लोकप्रियता ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पुरस्कारों की लंबी सूची

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को उनके जीवन में देश-विदेश से अनेक सम्मान प्राप्त हुए।

1. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार — 1956

1956 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। यह उनके शास्त्रीय संगीत में असाधारण योगदान की राष्ट्रीय मान्यता थी।

2. पद्मश्री — 1961

1961 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। यह उनके राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते प्रभाव और संगीत में योगदान की महत्वपूर्ण पहचान थी।

3. पद्मभूषण — 1968

1968 में उन्हें पद्मभूषण प्रदान किया गया। इस सम्मान ने स्पष्ट कर दिया कि शहनाई के इस महान साधक ने भारतीय कला-जगत में स्थायी स्थान बना लिया है।

4. पद्मविभूषण — 1980

1980 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। यह देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक है और उनके असाधारण संगीत योगदान का प्रमाण है।

5. ईरान का सम्मान — 1992

1992 में ईरान ने उन्हें Talar Mausiquee की उपाधि से सम्मानित किया। यह इस बात का प्रमाण था कि उनके संगीत की प्रतिष्ठा भारत की सीमाओं से बहुत आगे तक पहुंच चुकी थी।

6. संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप — 1994

1994 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप प्रदान की गई। संगीत नाटक अकादमी स्वयं अपनी फेलोशिप को अपने सर्वोच्च सम्मानों में से एक बताती है।

7. टी. चौडैया राष्ट्रीय पुरस्कार — 1995

उन्हें कर्नाटक सरकार से टी. चौडैया राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

8. स्वाति संगीत पुरस्कार — 1998

1998 में केरल सरकार का स्वाति संगीत पुरस्कार भी उनके सम्मान में जुड़ा।

9. भारत रत्न — 2001

और फिर आया वह क्षण जिसने उनके सम्मान को भारतीय इतिहास के सर्वोच्च नागरिक सम्मान तक पहुंचा दिया।

वर्ष 2001 में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। बिस्मिल्ला ख़ाँ उन चुनिंदा शास्त्रीय संगीतज्ञों में शामिल हुए जिन्हें यह सर्वोच्च सम्मान मिला।

इस सम्मान के साथ एक बात हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई—भारत की शहनाई अब केवल एक वाद्य नहीं थी; वह भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान बन चुकी थी।

सम्मान बहुत मिले, लेकिन दिल काशी में रहा

दुनिया उन्हें अपने मंचों पर बुलाती रही। पुरस्कार मिलते रहे। सम्मान बढ़ते रहे। लेकिन बिस्मिल्ला ख़ाँ का मन काशी और गंगा से जुड़ा रहा।

यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी।

उन्होंने प्रसिद्धि को अपनी जड़ों से बड़ा नहीं होने दिया।

आज जब सफलता के साथ लोग अक्सर अपनी पहचान और अपनी मिट्टी से दूर होते जाते हैं, बिस्मिल्ला ख़ाँ की कहानी इसके बिल्कुल विपरीत उदाहरण के रूप में सामने आती है।

शहनाई उनकी ‘संगिनी’ बन गई

उनके लिए शहनाई केवल वाद्य नहीं थी। वह उनकी जिंदगी की साथी थी।

उन्होंने अपनी शहनाई को बेहद आत्मीयता से अपनाया। उनकी कला में जिस प्रकार का भाव दिखाई देता है, उससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए शहनाई और कलाकार के बीच केवल वादक और वाद्य का रिश्ता नहीं था।

वह संवाद था।

एक साधक और उसके सुरों के बीच संवाद।

2006: एक महान युग का अंत

21 अगस्त 2006 को उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ का निधन हुआ।

उनके जाने से भारतीय संगीत जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसे भरना संभव नहीं था।

लेकिन महान कलाकार शरीर से जाते हैं, कला से नहीं।

बिस्मिल्ला ख़ाँ भी अपनी शहनाई के सुरों में आज तक जीवित हैं।

उनकी स्मृति में ‘उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ युवा पुरस्कार’

उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए संगीत नाटक अकादमी ने 2006 से उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ युवा पुरस्कार शुरू किया। यह युवा कलाकारों को संगीत, नृत्य और नाटक के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है।

यह सम्मान अपने आप में बताता है कि बिस्मिल्ला ख़ाँ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बने, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा बन गए।

आज भी क्यों जरूरी हैं बिस्मिल्ला ख़ाँ?

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सफलता हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी है।

बिस्मिल्ला ख़ाँ हमें पांच महत्वपूर्ण संदेश देते हैं—

पहला—साधना का कोई विकल्प नहीं।

दूसरा—प्रतिभा को अनुशासन की जरूरत होती है।

तीसरा—कला धर्म, जाति और सीमाओं से बड़ी होती है।

चौथा—विश्व प्रसिद्धि के बाद भी अपनी मिट्टी को नहीं भूलना चाहिए।

पांचवां—सच्ची कला समाज को जोड़ती है, तोड़ती नहीं।

मेरे ( चंद्र शेखर मौर्य) के संपादकीय निष्कर्ष: शहनाई आज भी बोलती है

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की कहानी केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति की कहानी है।

एक छोटे से वाद्य को लेकर एक कलाकार ने पूरी दुनिया को बता दिया कि भारत की आत्मा कितनी गहरी है।

उन्होंने शहनाई को मंच दिया, शहनाई ने उन्हें अमर कर दिया।

उनके पुरस्कारों की सूची लंबी है—संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, अकादमी फेलोशिप और अंततः भारत रत्न। लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान कोई पदक, प्रमाणपत्र या उपाधि नहीं था।

उनका सबसे बड़ा सम्मान था—लोगों के दिलों में बस जाना।

काशी के घाटों पर बहती गंगा की तरह उनका संगीत भी समय की सीमाओं से परे बहता रहेगा।

आज भी जब शहनाई की कोई मीठी धुन सुनाई देती है, तो कहीं न कहीं बिस्मिल्ला ख़ाँ की याद जरूर आती है।

क्योंकि—

कुछ कलाकार मंच से उतर जाते हैं,

कुछ कलाकार इतिहास बन जाते हैं,

लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं

जिनकी कला ही उनकी अमर आवाज़ बन जाती है।

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ उन्हीं अमर आवाज़ों में से एक हैं।

उनकी शहनाई खामोश हो चुकी है,

लेकिन उसके सुर आज भी भारत की आत्मा में गूंज रहे हैं।

यही है उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की सबसे बड़ी विरासत।


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