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भगत सिंह का अंतिम पत्र उन्होंने 22 मार्च 1931 को फाँसी से एक दिन पहले लिखा था..

भगत सिंह का अंतिम पत्र उन्होंने 22 मार्च 1931 को फाँसी से एक दिन पहले लिखा था। इस पत्र में उन्होंने अपने विचार, अपने बलिदान का उद्देश्य और समाज के प्रति अपनी आशाएँ व्यक्त की थीं।

भगत सिंह का अंतिम पत्र (22 मार्च 1931)

"इन्कलाब ज़िन्दाबाद!"

साथियो,
मैं अब फाँसी के फंदे पर झूलने जा रहा हूँ। मुझे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। बल्कि मुझे गर्व है कि मैं अपने देश की आज़ादी के लिए यह बलिदान दे रहा हूँ।

मुझे उम्मीद थी कि मेरे संघर्ष और बलिदान से मेहनतकश जनता में जागरूकता आएगी और वे अन्याय व शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाएँगे। मेरा सपना सिर्फ़ भारत की आज़ादी तक सीमित नहीं था, बल्कि मैं एक ऐसे समाज की कल्पना करता था जहाँ न कोई शोषक हो, न कोई शोषित।

मैं मरने से पहले बस इतना कहना चाहता हूँ कि क्रांति सिर्फ़ बम और पिस्तौल से नहीं आती, बल्कि विचारों से आती है। जब तक समाज में बराबरी, न्याय और स्वतंत्रता नहीं होगी, तब तक सच्ची आज़ादी नहीं मिल सकती।

मुझे यकीन है कि मेरे बाद भी यह संघर्ष जारी रहेगा और एक दिन हमारा सपना पूरा होगा।

इन्कलाब ज़िन्दाबाद!

भगत सिंह


भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश सरकार ने लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी थी। उनका यह पत्र उनकी क्रांतिकारी सोच और समाजवादी विचारधारा को दर्शाता है, जिसे आज भी लोग प्रेरणा के रूप में देखते हैं।


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