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आल्हा जयंती 2025 : आल्हा और ऊदल की कहानी, प्रेम गाथा इतिहास की जुबानी

आल्हा और ऊदल दो भाई थे। ये बुन्देलखण्ड के महोबा के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे। कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है। इस ग्रंथ में दों वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है। आखरी लड़ाई उन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ लड़ी थी। मां शारदा माई के भक्त आल्हा आज भी करते हैं मां की पूजा और आरती। जो इस पर विश्वास नहीं करता वे अपनी आंखों से जाकर देख सकता है।

आल्हाखण्ड ग्रंथ : आल्हाखण्ड में गाया जाता है कि

इन दोनों भाइयों का युद्ध दिल्ली के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज चौहान से हुआ था। पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हारना पड़ा था लेकिन इसके पश्चात आल्हा के मन में वैराग्य आ गया और उन्होंने संन्यास ले लिया था। कहते हैं कि इस युद्ध में उनका भाई वीरगति को प्राप्त हो गया था। गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था। पृथ्वीराज चौहान के साथ उनकी यह आखरी लड़ाई थी।
मान्यता है कि मां के परम भक्त आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था, लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा था। मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) शारदा मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी जिसे आज तक कोई सीधा नहीं कर पाया है। मंदिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चौहान की जंग की गवाही देते हैं।

सबसे पहले आल्हा करते हैं माता की आरती :

मान्यता है कि मां ने आल्हा को उनकी भक्ति और वीरता से प्रसन्न होकर अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की मानें तो आज भी रात 8 बजे मंदिर की आरती के बाद साफ-सफाई होती है और फिर मंदिर के सभी कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बावजूद जब सुबह मंदिर को पुनः खोला जाता है तो मंदिर में मां की आरती और पूजा किए जाने के सबूत मिलते हैं। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और ऊदल ही करते हैं।

इस मंदिर की पवित्रता का अंदाजा महज इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी भी आल्हा मां शारदा की पूजा करने सुबह पहुंचते हैं। मैहर मंदिर के महंत पंडित देवी प्रसाद बताते हैं कि अभी भी मां का पहला श्रृंगार आल्हा ही करते हैं और जब ब्रह्म मुहूर्त में शारदा मंदिर के पट खोले जाते हैं तो पूजा की हुई मिलती है। इस रहस्य को सुलझाने हेतु वैज्ञानिकों की टीम भी डेरा जमा चुकी है लेकिन रहस्य अभी भी बरकरार है।

मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में मैहर की माता शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है। मान्यता है कि शाम की आरती होने के बाद जब मंदिर के कपाट बंद करके सभी पुजारी नीचे आ जाते हैं तब यहां मंदिर के अंदर से घंटी और पूजा करने की आवाज आती है। कहते हैं कि मां के भक्त आल्हा अभी भी पूजा करने आते हैं। अक्सर सुबह की आरती वे ही करते हैं।

बुंदेली इतिहास में

आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही आदरभाव से लिया जाता है। बुंदेली कवियों ने आल्हा का गीत भी बनाया है, जो सावन के महीने में बुंदेलखंड के हर गांव-गली में गाया जाता है। जैसे पानीदार यहां का पानी आग, यहां के पानी में शौर्य गाथा के रूप से गाया जाता है। यही नहीं, बड़े लड़ैया महोबे वाले खनक-खनक बाजी तलवार आज भी हर बुंदेलों की जुबान पर है।

प्रेम कहानी की शुरुआत 

राजकुमारी फुलवा भारत देश की सुंदर कन्याओं में से एक थी। प्राचीन समय से चली आ रही रीति के अनुसार राजकुमारी को भी फूलों से तोला जाता था।

राजकुमारी फुलवा के सुंदर रूप को देखने के लिए लोग बहुत प्रयत्न किया करते थे। राजा मकरंदी के राज्य में दो बहुत ही प्रतापी और हर कला में निपुण अस्त्र शस्त्रों के ज्ञान से भरपूर दो भाई रहा करते थे, जिन्होंने अपनी योग्यता का प्रदर्शन हर तरफ किया हुआ था।

चारों तरफ दोनों भाइयों के चर्चे हुआ करते थे। उन दोनों भाइयों के नाम आल्हा, जो बड़ा भाई था तथा छोटा भाई का नाम उदल था। उदल देखने में बहुत ही सुंदर था। दोनों भाई अपना समय बाहर घूमने में ही व्यतीत किया करते थे। एक बार जब आल्हा और उदल घूमते हुए नरवर आ गए थे। तब उदल ने राजा मकरंदी की बहन राजकुमारी फुलवा को पहली बार देखा था।

वह फुलवा को देखकर बहुत मंत्रमुग्ध हो गए थे और उदल को राजकुमारी फुलवा से प्रेम हो गया था। पूरे राज्य में जब आल्हा और उदल की चर्चाएं होने लगी थी कि दो भाई में से छोटा भाई सबसे सुंदर है जिसकी सुंदरता देखने लायक है। जब यह बात राजकुमारी फुलवा तक पहुंची तब राजकुमारी फुलवा को भी उदल को देखने का मन करने लगा और राजकुमारी फुलवा को उदल से मिलने की इच्छा होने लगी।
एक दिन जब उदल को राजकुमारी के बारे में पता लगा तब वह राजकुमारी के महल नरवल किले में आ गए और यह खोजबीन करने लगे कि राजकुमारी फुलवा तक कैसे पहुंचा जा सकता है?

तब उदल को पता लगा कि राजकुमारी के लिए उनकी एक नौकरानी रोज फूलों का हार बना कर ले जाया करती थी। यह देख कर उदल ने राजकुमारी फुलवा की नौकरानी से कहा कि मैं आज तुमको एक फूलों का हार बना कर दे रहा हूं जिसको तुम अपनी महारानी को दे देना।

उदल को फूलों की माला बनाने में बहुत ही महारत हासिल थी। वह बहुत ही सुंदर सुंदर माला बनाया करता था जिसको देखकर लोग उसकी सुंदरता का पता नहीं लगा पाते थे। जब उदल ने राजकुमारी के नौकरानी को माला बनाकर दे दिया, तो वह नौकरानी तुरंत उसे लेकर राजकुमारी फुलवा के पास चली गई और उनको उदल के द्वारा बनाई हुई माला दे दी। राजकुमारी ने जैसे ही उस माला को देखा तो वह उसे देखकर मंत्रमुग्ध हो गई।

और उन्होंने अपनी नौकरानी से कहा कि आज माला तो बहुत सुंदर बनी है। यह माला आज तक तुमने कभी भी मेरे सामने नहीं लाई। तब राजकुमारी फुलवा की नौकरानी ने कहा कि महारानी यह माला मैंने नहीं बनाई है। यह माला तो किसी और ने बनाई है। तब राजकुमारी फुलवा ने अपनी नौकरानी से कहा कि मैं उस व्यक्ति से मिलना चाहती हूं, जिसने यह सुंदर सी माला बनाई है।

कल तुम उसको मेरे पास लेकर आना। जिसके बाद राजकुमारी फुलवा की बात सुनकर नौकरानी ने उदल को राजकुमारी फुलवा से मिलने के लिए कहा और नौकरानी उदल को महिला के कपड़े पहना कर महल के अंदर राजकुमारी फुलवा के पास ले गई।

राजकुमारी ने जैसे ही उदल को देखा तो वह उदल के रूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई और एक ही नजर में वह उदल से प्यार करने लगी और फिर राजकुमारी फुलवा ने उदल को अपने ही पास रोक लिया और उसको अपने ही कक्ष में छुपा लिया उदल और राजकुमारी फुलवा बहुत दिनों तक एक साथ रहे।

एक बार जब राजा मकरंदी ने अपनी बहन राजकुमारी फुलवा को फूलों से एक बार फिर से तौलवाया तो, राजकुमारी का वजन बढ़ा हुआ पाया जिससे राजा मकरंदी को शक हो गया कि राजकुमारी फुलवा को किसी पुरुष ने छुआ है। जिसके कारण राजा बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने सभी सैनिकों और नौकरों से कहा कि तुम लोग जाकर राजकुमारी फुलवा के कमरे में चेक करो कि कोई पुरुष तो वहां पर नहीं है।
और पूरे महल में भी तलाशी करो। राजा की आज्ञा के कारण सभी नौकरों ने और उनके सिपाहियों ने जैसे ही राजकुमारी फुलवा का कमरा चेक किया तो.

राजकुमारी के कमरे में उदल को पाया जिसके बाद सारे सैनिक ऊदल को पकड़कर राजा के पास ले गए। राजा ने उदल को बंदीगृह में डाल दिया और उसको कारागार में रहने की सजा सुनाई। धीरे धीरे छह महीने बीत चुके थे।

उधर आल्हा को अपने छोटे भाई की चिंता होने लगी थी। जिसके बाद आल्हा ने तुरंत अपने छोटे भाई उदल को खोजने के लिए इधर उधर जांच करना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के पश्चात जब आल्हा को पता चला कि उसके छोटे भाई उदल को नरवर किले के राजा मकरंदी ने अपने कारागार में बंदी बनाकर रखा है। यह सुनकर आल्हा को नरवर के राजा पर बहुत क्रोध आया और आल्हा ने अपने गुरु के पास जाकर सारी बातें बता दी।
आल्हा के गुरु ने आल्हा को युद्ध करने की सलाह दी जिसके बाद आल्हा नरवर के लिए पर आक्रमण कर दिया और उसके सारे सैनिकों को मार गिराया। आल्हा ने नरवर किले को तोड़ते हुए किले के अंदर प्रवेश किया। किले के अंदर छिपे हुए सैनिकों को बहुत बुरी तरीके से घायल कर दिया। सैनिक अपनी जान बचाते हुए राजा के पास पहुंच गए। जब राजा ने अपने घायल सैनिकों को देखा तो, उन्होंने अपने सैनिकों से पूछा कि यह हालत तुम्हारी किसने की है?

सैनिकों ने बताया कि उदल के बड़े भाई आल्हा ने हम लोगों पर आक्रमण कर दिया है और हमारे सारे सैनिकों को मार दिया है। यह सुनकर राजा बहुत डर गए और तुरंत भागते हुए आल्हा के पास चले गए। आल्हा के पास जाकर उन्होंने अपने आपको आल्हा को सौंप दिया और तुरंत आल्हा के छोटे भाई उदल को रिहा करने का आदेश दे दिया।

राजा ने आल्हा से अपने किए हुए दुष्कर्म की क्षमा भी मांगी। आल्हा ने राजा को माफ कर दिया और फिर उदल और फुलवा का विवाह बहुत खुशी खुशी करवा दिया गया जिसके बाद वह दोनों खुशी-खुशी अपना जीवन यापन करना शुरू कर दिए।


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