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राम वन गमन की कथा सुन सुन भावुक हुए श्रद्धालु

देवरिया।बरहज नगर पालिका क्षेत्र के अंतर्गत पचौहा वार्ड में स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर पर चल रहे श्री राम कथा के पांचवें दिन कथा बाचक विशम्बर शरण जी महाराज
ने भगवान की कथा का रसपान कराते हुए कहा कि 
चक्रवर्ती महाराज दशरथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को राजतिलक करने का विचार किया गुरु वशिष्ठ को बुलाकर उन्होंने सुंदर-सुदिन
देखने की बात कही गुरुदेव वशिष्ठ ने कहा कि राम के राज्याभिषेक के लिए प्रतिदिन प्रतिपल मंगल है महाराज दशरथ ने प्रभु श्री राम को राज्याभिषेक की घोषणा की गोस्वामी जी ने लिखा कि सुन्नत राम अभिषेक सुहावा। 
बाजत गहागह अवध  बधावा।।
पूरे अवध में इस बात की खबर फैल गई कि कल राम अयोध्या के राजा होंगे माताएं राम के राज्याभिषेक को सुनकर घर-घर मंगल कलश और आरती सजने लगी। जैसे ही इस बात की जानकारी देवताओं को हुई देवता घबरा गए देवताओं ने कहा की राम का जन्म तो हम लोगों के कार्य के लिए हुआ था अगर अयोध्या के राजा हो जाएंगे तो हम लोगों का क्या होगा देवता गण मां सरस्वती से प्रार्थना करने लगे कि किसी तरह राम जी का बन हो जाए। सरस्वती ने देवताओं को पहले तो फटकार लगाई सरस्वती ने कहा कि 
ऊच निवास निच करतुती।
देखी न सकही पराई बिभूती।।
सरस्वती ने कहा कि आप लोग देवता है राम राजा हो रहे हैं और आप लोग मां की बात करते हैं बड़े अनुय विनय के बाद सरस्वती ने कहा पता लगाइए की अयोध्या में कौन ऐसा प्राणी है जिसने कभी सरयू का नीर ग्रहण न किया हो मैं उसी की बुद्धि परिवर्तित कर सकती है देवताओं ने कहा मंथरा सरस्वती ने मंथरा की बुद्धि पर प्रहार किया जहां राम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी आधी रात में मंथरा अयोध्या में घूम कर उत्सव के तैयारी को देख रही थी 
और राजमहल में पहुंचकर से कहा कि कल राम राजा होंगे भरथ बंदी गृह में होंगे यही सुंदर अवसर है की राम को राजा ना होने दे भरथ के लिए महाराज शपथ दिलवाकर वरदान मांग ले। इधर उत्सव की तैयारी चल रही थी उधर महारानी कैकयी मंथरा  के कहने पर  राजसी वस्तु त्याग कर फटे पुराने कपड़े धारण कर भूमि पर लेट गई राम के राज्याभिषेक की सूचना लेकर चक्रवर्ती महाराज दशरथ कैकयी के के भवन में पहुंचे ऐसी हालत देखकर दशरथ जी काप गए कैकयी ने कहा आपके पास मेरे दो वरदान है आज मुझे वह दे दीजिए चक्रवर्ती महाराज दशरथ जी ने कहा दो वरदान की बात करती हो कर मांग लो।
रघुकुल रीत सदा चली आई। 
प्राण जाए पर वचन न जाई।।
इतना सुनते ही कहीं में बार मांगना शुरू किया 
प्रथमहि बर भरथही कर टीका।
दूसरा वर मांगहू कर जोरी।पुरवहू नाथ मनोरथ मोरी।
दूसरे वरदान में राम के लिए वन मांग लिया यह सुन महाराज दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़े और उन्हें श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप की याद आने लगी पिता के आदेश का पालन कर प्रभु श्री राम जानकी और लक्ष्मण जी वन के लिए चल पड़े।
कथा के दौरान रविंद्र पाल, संत पारस जी महराज ,उदय भान पाल ,पतरूपाल, विद्यानिवास मिश्र, पुजारी विद्यासागरमिश्र,राघवेंद्र शुक्ल ,रामविलास, रतनमिश्र, मनोज सिंह ,सोनू सिंह,मोनू सिंह ,बैजनाथ पाल ,राजेंद्र, रविंद्र महाराज ,राजेश सिंह, विनोद गुप्ता, मनोज मिश्रा, मनोज पटेल, लाल साहब यादव ,शकुंतला देवी, लाल परी ,किसमावती देवी ,अर्चना ,हरिशंकर, रामाज्ञा,दीनदयाल पाल वीरेंद्र कुमार,ध्रुवधर जी द्विवेदी, बिरेंद्र मिश्र सहित सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालु जन उपस्थित रहे।


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