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आत्मा परमात्मा का मिलन है परमानंद की प्राप्ति है

देवरिया।लार विकासखंड के अंतर्गत ग्राम सभा कुंडावलतारा में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस कथा व्यास आचार्य श्री ब्रजेश मणि त्रिपाठी जी ने बताया कि जब तक यह जीव जगत के विषयों में फंसा रहेगा तब तक वह आनंद नहीं प्राप्त कर सकता है। आनंद संसार में नहीं है आत्मा और परमात्मा के मिलन में ही परमानंद है। आज का मानव स्वयंभू बनना चाहता है उसे शास्त्र और शास्त्राज्ञा से कोई लेना-देना नहीं है सब मनमुखी आचरण कर रहे हैं।शास्त्रों में कथित वाक्यों के अनुसार ही वर्तमान में सभी स्त्री पुरुष ब्राह्मणद्वेषी तथा चरित्रहीन हो रहे हैं ।
वर्तमान में जितने भी शिक्षित - अशिक्षित स्त्री पुरुष दिखाई दे रहे हैं, वे प्रायः सभी शास्त्रविमुख तथा धर्मविमुख,भोगबुद्धि तथा व्यभिचारबुद्धि के ही दिखाई दे रहे हैं।
कोई कोई ही शास्त्रों के अध्ययन में रत हैं। कुछ ब्राह्मण तो मात्र आजीवका की दृष्टिमात्र रखते हुए, पूजा पाठ तक ही सीमित हैं। वे ब्राह्मण तथा अन्य स्त्री पुरुष एकसमान ही शास्त्रों से अनभिज्ञ हैं। जैसे-सामान्य स्त्री पुरुषों को शास्त्रों के विषय में ज्ञान नहीं होता है, इसी प्रकार से आजीविका मात्र के लिए पढ़नेवाले ब्राह्मण भी शास्त्रों से अनभिज्ञ ही होते हैं। 
जिस कर्म काण्ड को करवाते हैं,उसका भी पूर्ण ज्ञान नहीं होता है। जिस ग्रंथ की कथा करके आजीविका संचालित करते हैं, उन कथावाचकों को उसी रामायण,भागवत, शिवपुराण आदि का ज्ञान नहीं होता है। समाज भी घोर अज्ञानी है तो इनके उपदेष्टा भी घोर अज्ञानी ही हैं। 
संस्कृत भाषा का ही ज्ञान नहीं है तो,संस्कृत भाषा में लिखे हुए अठारह पुराणों का ही ज्ञान कैसे होगा!
अर्थात कलियुग में उपदेश करनेवाले प्रायः ब्राह्मणों को भी वेद, पुराण,धर्मशास्त्र महाभारत आदि किसी का भी ज्ञान नहीं होता है। क्यों कि- उनका उद्देश्य तो मात्र आजीवका ही होता है। ज्ञान प्राप्त करना उद्देश्य नहीं होता है।
ऐसी अवस्था में ब्राह्मण भी, सामान्य स्त्री पुरुषों के समान अनभिज्ञ और अज्ञानी हैं। इसीलिए वे भी अतिदुखी रहते हैं। अज्ञानता ही तो सर्वदुखों का कारण है। कपिल भगवान मां देवहुति माता को समझाते हुए कहते हैं कि -
चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये।।
मन ही संसार में बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का कारण है। मन के सुधरने पर ही सब कुछ सुधरता है और मन के बिगड़ने पर सब कुछ बिगड़ा है।
कथा में आगे सति चरित्र और ध्रुव चरित्र की सुंदर व्याख्या करते हुए जड़ भरत चरित्र तक की कथा श्रवण करायी गई ।


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