Latest News / ताज़ातरीन खबरें

भगवान कृष्ण की बाल लीला की कथा सुन हर्षित हो उठे श्रद्धालु

देवरिया।ग्राम सभा कुण्डावलतारा में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस कथा व्यास आचार्य ब्रजेश मणि त्रिपाठी जी ने भगवान श्रीकृष्ण के बाल चरित्र की कथा को श्रवण कराया। कथा व्यास ने बताया कि भगवान जब आते हैं तब प्रकृति अपना अद्भुत श्रृंगार करती है । नदियां, आकाश , अग्नि , भूमि वायु सब निर्मल हो जाते हैं। सभी ब्रजवासियों को ऐसा लगता है मानो उन्हें अपने जीवन का आनंद ही प्राप्त हो गया। छ: दिन उत्सव मनाया गया तो विघ्न के रूप में पूतना का आगमन हो गया। भगवान जब 108 दिन के हुए तो शकटासुर आया और छः महीने के हुए तो तृणावर्त का उद्धार किया। इस प्रकार भगवान अपने जीवन के आरंभ से ही कर्म की गति बना लेते हैं। ऐसी ही प्रभु की एक लीला है मृद भक्षण की जो श्रीमद्भागवत पुराण की सबसे दिव्य और प्रसिद्ध लीलाओं में से एक है।
एक बार बालकृष्ण  अपने सखाओं और बलराम जी के साथ आंगन में खेल रहे थे। खेलते-खेलते उन्होंने मिट्टी का एक ढेला उठाकर अपने मुख में रख लिया। उनके सखाओं ने इसकी शिकायत माता यशोदा से कर दी। यशोदा मां तुरंत वहां पहुँचीं और श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर उन्हें डांटते हुए कहा, "कान्हा! तूने मिट्टी क्यों खाई?"
कृष्ण ने बड़ी मासूमियत से उत्तर दिया, "मैया! मैंने मिट्टी नहीं खाई है, ये सब झूठ बोल रहे हैं। यदि तुझे विश्वास नहीं, तो मेरा मुख देख ले।" जब मैया यशोदा ने श्रीकृष्ण को मुख खोलने को कहा, तो जैसे ही कान्हा ने अपना मुख खोला, यशोदा मां स्तब्ध रह गईं। उन्हें श्रीकृष्ण के नन्हे से मुख में चराचर जगत, सप्त द्वीप, आकाश, नक्षत्र, सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, वायु और यहाँ तक कि स्वयं ब्रज और स्वयं को भी श्रीकृष्ण के मुख में देखा।
यह दृश्य देखकर माता यशोदा मूर्छित होने लगीं और डर गईं कि क्या यह कोई माया है या उनका बालक कोई देवता है। तब भगवान ने अपनी 'वैष्णवी माया' फैला दी और यशोदा मैया पुनः सब भूलकर उन्हें अपना पुत्र मानकर लाड करने लगीं।
इस अलौकिक घटना के पीछे गहरे आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं:
 यह कथा सिखाती है कि जो परमात्मा पूरे ब्रह्मांड का स्वामी (विराट) है, वह प्रेम के वशीभूत होकर एक छोटे से बालक (सूक्ष्म) के रूप में आपकी गोद में भी बैठ सकता है। ईश्वर की महानता और उनकी सरलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
 यशोदा मैया को जब श्रीकृष्ण के ईश्वर होने का ज्ञान हुआ, तो वे डर गईं। लेकिन भगवान चाहते थे कि यशोदा उन्हें 'ईश्वर' नहीं बल्कि 'पुत्र' समझकर प्रेम करें। इसलिए उन्होंने अपनी माया से उनके ज्ञान को ढंक दिया। यह दर्शाता है कि भगवान को ऐश्वर्य और ज्ञान से अधिक भक्त का निष्काम प्रेम प्रिय है।
 मिट्टी खाना एक साधारण मानवीय क्रिया थी, लेकिन उसके भीतर पूरा ब्रह्मांड दिखना यह बताता है कि इस जगत का कण-कण ईश्वर का ही रूप है। प्रकृति और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं।
श्रीकृष्ण की यह लीला हमें सिखाती है कि भक्ति में इतनी शक्ति है कि साक्षात् ब्रह्मांड नायक भी माता के प्रेम के सामने एक साधारण बालक बनकर बंध जाता है।


Leave a comment

Educations

Sports

Entertainment

Lucknow

Azamgarh